Skip to main content

जाने क्यों और किसने इक्कीस बार धरती से क्षत्रियों का अस्तित्व मिटाया था ?

एक बार की बात है जब देवताओं और दानवों के सारे मतभेद समाप्त हो गए थे| तभी धरती पर क्षत्रियों का राज था सत्ता और ताकत के मद में चूर क्षत्रिय राजा निरंकुश होते जा रहे थे| उस समय सशत्रबाहू नामक क्रूर शाशक का राज था उसके बारे में प्रचलित था की उसने लंकापति रावण को भी हराया था|

सशत्रबाहू एकदिन अपने पुरे काफिले के साथ राज्य का भ्रमण कर रहा था तभी रास्ते में उसे ऋषि वशिष्ट का आश्रम दिखा| आश्रम के समीप पहुँचते ही पता नहीं उसे क्या हुआ उसने बिना सोचे समझे और बिना किसी कारण के सारा आश्रम पानी से भरवा दिया|

जब ऋषि ने ये देखा तो उससे ऐसा करने का कारण पूछा जवाब देने की जगह सशत्रबाहू निर्लज्जता पूर्वक हंसने लगा| इसपर क्रोधित होकर ऋषि वशिष्ट ने उसे डांट लगाई इसपर उसने अभिमानवश उत्तर दिया की हे निर्बल ब्राह्मण मैं चाहूँ तो अभी तुम्हे मार सकता हूँ|इसपर क्रोधित हो कर ऋषि वशिष्ठ ने सशत्रबाहू को श्राप दिया की एक ब्राह्मण ही तुम्हारे घमंड को तोड़ेगा|

सशत्रबाहू को भगवान् दत्तात्रेय से वरदान प्राप्त था की युद्ध के समय उसके हज़ार हाँथ हो जायेंगे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहू पड़ा| चूँकि महर्षि वशिष्ट के श्राप की वजह से उसका और उसके पुरे कुल का विनाश निश्चित था और परशुराम ही वो बाहुबली ब्राह्मण थे जिनके हाथों ये कार्य होना था|

परशुराम ऋषि जमद्व्ग्नी और देवी रेणुका के पुत्र थे| परशुराम को भगवान् शिव से कई वरदान प्राप्त थे जिनमे अश्त्र शस्त्र और सारे वेदों का ज्ञान प्रमुख था साथ ही मन की गति से कहीं भी आने जाने की शक्ति थी|

एक बार सहस्त्रबाहू ने ऋषि जमद्व्ग्नी से कामधेनु मांगी इसपर ऋषि ने कहा की ये गौ शप्तऋषियों की गाय है और उन्हें इसकी सेवा करने का अवसर कुछ ही दिनों के लिए मिला है| इतना सुनते ही सहस्त्रबाहू क्रोध से पागल हो गया और बलपूर्वक कामधेनु को लेकर अपने महल की ओर चल पड़ा|

परन्तु परशुराम को जब ये बात पता चली तो उन्होंने सहस्त्रबाहू को रास्ते में रोक कर गाय वापस देने को कहा| सहस्त्रबाहू ने कहा तुम मेरी प्रजा हो और प्रजा की हर वस्तु पर राजा का अधिकार है अगर हिम्मत है तो मुझसे युद्ध करो और जीत कर गाय वापस ले जाओ|

परशुराम को भगवान् शिव से वरदान प्राप्त था की कोई भी क्षत्रिय उन्हें हरा नहीं पायेगा| सहस्त्रबाहू और उसके दस हज़ार पुत्रों से भीषण युद्ध में परशुराम ने ने सहस्त्रबाहू के हज़ार हाँथ काट दिए और उसके अधिकतर पुत्र भी मारे गए|

इसके बाद कामधेनु को आश्रम पहुंचाकर स्वयं तीर्थ पर चले गए| उपयुक्त अवसर देख कर बचे हुए क्षत्रियों ने ऋषि जमद्व्ग्नी का शीश काट दिया और देवी रेणुका को भी प्रताड़ित किया|

देवी रेणुका ने परशुराम को आवाज़ लगाई तो परशुराम विध्युतगति से वह पहुंचे और सारी बात जान कर प्राण किया की वो धरती पर से समस्त क्षत्रियों का विनाश कर देंगे| इसके बाद उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी पर से क्षत्रियों का विनाश किया था|

परशुराम अपने पिता को पुनर्जीवित करने के लिए के लिए कुरुक्षेत्र में यज्ञ किया और फलस्वरूप ऋषि जमद्व्ग्नी पुनर्जीवित हो कर शप्तऋषियों में शामिल हुए|

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

श्री हनुमान चालीसा और उसका सम्पूर्ण अर्थ - Hanuman Chalisa

जय हनुमान जी की. भक्तों, आपको श्री हनुमान चालीसा के बारे में तो पता ही होगा। हो सकता है आप इसका जाप भी करते हों. परन्तु, क्या आपको चालीसा की सभी दोहों का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो आप नीचे लिखे हुए दोहे और उनके अर्थ के बारे में जान सकते हैं. Hanuman Chalisa ka matlab – What is the meaning of Hanuman Chalisa? दोहा 1 : श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि | बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि || अर्थ: “शरीर गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।” दोहा 2 : बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार || अर्थ: “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।” दोहा 3 : जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥ अर्थ: “श्री हनुमान जी!आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कप