महाराजा कौशिक के महर्षि विश्वामित्र बनने की कथा

आज हम बात करेंगे महर्षि विश्वामित्र के बारे में शायद ही आपको पता होगा की महर्षि विश्वामित्र का असली नाम महाराजा कौशिक था और वह किसी ऋषि या ब्राम्हण की संतान न होकर एक क्षत्रिय राजा की संतान थे| आइये जानते हैं महाराज कौशिक से महर्षि विश्वामित्र बनने के सफर की कथा| बहुत समय पहले की बात है एक राजा हुआ करते थे जिनका नाम महाराजा कुषा था| महाराजा के शासन काल में प्रजा बहुत सुखी थी महाराज भी अपनी प्रजा का लालन पालन अपने पुत्र की तरह ही करते थे|

महाराज कुषा के चार पुत्र थे उनमे से एक पुत्र का नाम कुशनाबर था उनके पास भगवान का दिया सब कुछ था| परन्तु महाराजा को एक ही दुख था उनकी कोई संतान नहीं थी यह बात उन्हें भीतर ही भीतर खाये जा रही थी| महाराज का यह दुख उनके कुलगुरु से देखा नहीं गया तब उन्होंने उन्हें पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करने की सलाह दी| इस यज्ञ के फलस्वरूप उनके घर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ यही बालक आगे चल कर उनके राज्य का उत्तराधिकारी बना और महाराज कौशिक के नाम से प्रचलित हुआ| राजा कौशिक बड़े ही दयालु स्वभाव के थे वह अक्सर अपनी प्रजा का हाल चाल जानने के लिए उनके बीच जा कर उनसे मिलते और उनकी कुशलता का समाचार लेते रहते थे|

एक दिन ऐसे ही भ्रमण करते हुए वह अपनी विशाल सेना के साथ जंगल की ओर निकल जाते हैं ज्यादा देर हो जाने की वजह से उनकी सेना भूख प्यास से बेहाल हो उठी| अपनी सेना की यह हालत देख कर उन्होंने अपने काफिले को आस पास कोई मकान या कुटिया ढूंढने का आदेश दिया| परिणाम स्वरुप उन्हें महर्षि वशिष्ठ की कुटिया दिखाई दी उन्होंने स्वयं जाकर महर्षि वशिष्ठ को सादर प्रणाम किया और सारा हाल बताया| उनकी बात सुनकर महर्षि वशिष्ठ मुस्कुराये और उन्होंने महाराजा कौशिक को कहा की कोई बात नहीं आप अपने सभी सैनिकों को लेकर अंदर आएं और भोजन का आनंद लें| राजा और उनके सैनिकों ने तरह तरह के व्यंजनों का आनंद लिया भोजन करने के बाद राजा ने कौतुहलवश ऋषि से पुछा की आपने इतने लोगों के भोजन का प्रबंध कैसे किया? तब ऋषि ने बताया की मेरे पास एक नंदिनी नाम की गाय है यह उसी की कृपा है| यह सुन कर राजा के मन में लालच जाग गया और उन्होंने महर्षि से गाय देने का आग्रह किया तब महर्षि ने कहा की यह साधारण गाय नहीं है यह वर्षों से मेरे साथ है इसे छोड़ कर आप जो मांगेंगे वह दे दूंगा परन्तु यह गाय नहीं दे सकता|

इतना सुनते ही महाराजा के क्रोध की सीमा न रही और उन्होंने नंदिनी गाय को बलपूर्वक लाने का आदेश दिया| जब राजा के पुत्रों ने नंदिनी को बलपूर्वक ले जाना चाहा तो वशिष्ठ मुनि ने एक राजकुमार को छोड़ कर बाक़िओं को जला कर भस्म कर दिया| साथ ही नंदिनी ने सारी सेना का विनाश कर दिया इससे आहत होकर राजा ने सारा राजपाट अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने निकल पड़े| उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर शिव जी ने उन्हें सभी शस्त्रों का ज्ञान दिया| राजा वरदान पाकर ऋषि वशिष्ठ से युद्ध करने निकल पड़े ऋषि ने उनके सभी वार विफल कर दिए और उनपर ब्रम्हास्त्र का प्रयोग कर दिया| तब देवताओं ने उनसे ब्रम्हास्त्र वापस लेने की विनती की तब वशिष्ठ ऋषि ने ब्रम्हास्त्र वापस ले लिया| अपनी हार से द्रवित हो कर राजा फिर से तपस्या करने निकल पड़े और इसी तप के फलस्वरूप उन्हें महर्षि विश्वामित्र की उपाधि मिली|

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