आरोग्य के देवता : धन्वंतरि

भगवान विष्णु के 12वें अवतार धन्वंतरि को देवताओं का चिकित्सक यानि वैद्य माना जाता है| समुद्र मंथन के दौरान धन्वंतरि 14 रत्नों में से एक थे| आइए जानते है कुछ बातें धन्वंतरि के बारे में :-

हिन्दू धरम में धन्वंतरि आयुर्वेद के भगवान माने जाते हैं| इन्होने कई औषधियों की खोज की हैं| जिसके कारण इन्हे महान चिकित्सक की उपाधि और देव पद की प्राप्ति हुई| धन्वंतरि की उत्पति समुद्र मंथन के समय कार्तिक मास की चतुर्थी को हुई| इसलिए दिवाली से दो दिन पहले भगवान धन्वंतरि का जन्म धनतेरस के रूप में मनाया जाता है| पीतल धातु इन्हें बहुत प्रिय है, इसलिए धनतेरस के दिन पीतल की चीज़ों का खरीदना बहुत शुभ माना जाता है|

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विष्णु जी के समान इनकी भी चार भुजाएं हैं| एक हाथ में शंख, दूसरे हाथ में चक्र, तीसरे में औषधि और चौथी में अमृत कलश लिए धन्वंतरि ने आयुर्वेद की संरचना की थी| धन्वंतरि ने इंद्र देव से इसे सीखा और लोगों के रोग दूर करने के लिए इस्तेमाल किया| धन्वंतरि के अनुसार 100 प्रकार की मृत्यु मुमकिन है परन्तु केवल 1 ही काल मृत्यु है| बाकि सभी अकाल मृत्यु है जिनका उपचार किया जा सकता है|

धनवंतरि केवल औषधि से ही नहीं, औषधि के साथ साथ मंत्रों की मदद से उपचार करते थे|

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:

अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप

श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

इस मंत्र का अर्थ है कि परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को नमन है।

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धन्वंतरि भगवान का पूजन पुरे भारत में होता है परन्तु केरल में इनका सबसे बड़ा और भव्य मंदिर है| गुजरात, तमिलनाडु जैसे कई जगहों पर भगवान धन्वंतरि के कई मंदिर हैं|

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भगवान धन्वंतरि के बारे में यह भी कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान सभी देवताओं को यज्ञभाग दिया गया परन्तु इन्हें नहीं| फिर भगवान विष्णु ने इन्हें बताया कि ये काशी के राजा धन्व के पुत्र में जन्म लेंगे और पूजे जाएंगे| ऐसा ही हुआ जब इन्होनें आयुर्वेद के अष्टांग की खोज की तब से इन्हें हर जगह पूजा जाने लगा|

माना तो यह भी जाता है की पृथ्वीलोक एवं स्वर्गलोक में जब बीमारियां फैलने लगी तो भगवान विष्णु चिंतित हो उठे| तब विष्णु जी ने कहा कि मैं धन्वंतरि का अवतार ग्रहण कर और इंद्र से आयुर्वेद को प्राप्त करेंगे| अतः तीनों लोकों में आयुर्वेद को प्रचलित करेंगे|

आयुर्वेद की सबसे पुरानी धन्वंतरि निघण्टु नामक पुस्तक खुद भगवान धन्वंतरि ने लिखी है| इस पुस्तक के तीन भाग हैं जिसमे से एक भाग आज भी प्रचलित है, जिसके अंतर्गत 373 दवाइयों और औषधियों का उल्लेख मिलता है|

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