Skip to main content

शिवरात्री की शुरुआत और उसके फल के बारे में जाने

स्कन्दपुराण में वर्णित कथा के अनुसार बहुत समय पहले चण्ड नाम का एक दुष्ट किरात था। वह मछलियों को जाल लगा कर पकड़ता था और साथ ही बहुत से पशुओं और पक्षियों की हत्या भी करता था इतना ही नहीं उसकी पत्नी का स्वभाव भी ठीक उसके जैसा ही था और वो भी उसी की तरह बड़ी निर्मम थी।

इस प्रकार उनका जीवन चलता रहा और बहुत से वर्ष बीत गए। एक दिन की बात है वह एक बनैले शूकर को मारने के उद्देश्य से पात्र में जल लेकर एक बिल्व पेड़ पर चढ़ गया| और नींद से बचने के लिए बेल के वृक्ष की पत्तियाँ तोड़ कर निचे फेंकता रहा। उसके बाद भी नींद ने उसका पीछा न छोड़ा तो उसने अपने साथ लाये पात्र के जल से अपना मुख धोया जो की नीचे स्थित शिवलिंग पर गिर पड़ा।

इस प्रकार उसने सभी विधियों से शिव की पूजा की, जैसे की जलाभिषेक कराना, उस के बाद बेल की पत्तियाँ चढ़ाना, साथ ही वो रात्रि भर जागता रहा और पूरे दिन भूखा भी रहा। उसके बाद वह नीचे उतरा और एक तालाब के पास जाकर मछली पकड़ने लगा। वह उस रात्रि घर नहीं जा सका था जिसकी वजह से उसकी पत्नी बिना अन्न-जल के पड़ी रही और चिन्ताग्रस्त हो उठी।

जब सुबह हुई तो वह भोजन लेकर पहुँची और अपने पति को एक नदी के दूसरी और के किनारे पर देखा ख़ुशी के मारे उसने गलती से भोजन को तट पर ही रख दिया और नदी को पार कर उसके पास पहुंची। दोनों ने स्नान किया, किन्तु इसके पूर्व कि किरात और उसकी पत्नी भोजन के पास पहुँचते एक कुत्ते ने सारा भोजन खा लिया। किरात की पत्नी को बड़ा क्रोध आया और उसने कुत्ते को मारना चाहा लेकिन किरात ने उसे रोक दिया, क्योंकि अब उसका हृदय पसीज चुका था वो समझ चूका था की भूख से व्याकुल जीव की मनोदशा क्या होती है। तब तक (अमावस्या का) दोपहर का वक़्त हो चुका था। किरात ने अनजाने में शिव की पूजा कर ली थी और दोनों ने चतुर्दशी पर उपवास किया था इस पुण्य के फलस्वरूप शिव के दूत दोनों पति-पत्नी को लेने आ गए और दोनों शिवलोक को गए।

गरुड़पुराण में जो कथा है यो इस प्रकार है- बहुत समय पहले निषादों का राजा सुन्दरसेनक आबू पर्वत पर रहता था| एक दिन निषाद राज सुन्दरसेनक अपने कुत्ते के साथ शिकार खेलने गया परन्तु वह किसी भी पशु का शिकार न कर सका और भूख-प्यास से व्याकुल हो उठा|उस गहन वन में थक कर एक तालाब के किनारे जा पहुँच और भूखे होने की वजह से रात्रि भर जागता रहा। उस तालाब के किनारे एक बिल्ब (बेल) के पेड़ था और उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था जो की पत्तियों से ढका हुआ था|

अपने शरीर को आराम देने के लिए उसने अनजाने में शिवलिंग पर गिरी बिल्व पत्तियाँ नीचे उतार कर इकट्ठा कर लिया। अपने पैरों की धूल को साफ़ करने के लिए उसने तालाब के जल से अपने पैरों को धोया और ऐसा करने से दौरान जल की कुछ बूँदें शिवलिंग पर जा गिरीं| इसी क्रम में उसके तरकश से एक तीर निकलकर शिवलिंग पर गिरा और उसे उठाने के लिए उसे शिवलिंग के समक्ष झुकना पड़ा।

इस प्रकार उसने अनजाने में शिवरात्री की पूजा की जैसे शिवलिंग को नहलाया, छुआ और उसकी पूजा की और साड़ी रात्रि जागता भी रहा। अगले दिन प्रातः काल होने पर वह अपने घर लौट आया और थकान मिटाने के लिए स्नान किया और उसके उपरान्त पत्नी द्वारा दिया गया भोजन किया| जब उसकी मृत्यु हुई तो यमदूत उसे यमलोक ले जाने लगे रास्ते में शिव के सेवकों ने उनसे युद्ध किया और उसे शिवलोक ले गए।

शिवरात्री को शिव पूजन करने से वह पाप रहित हो गया था और कुत्ते के साथ भगवान् शिव का सेवक बना। इस प्रकार उसने अज्ञान में ही सही परन्तु पुण्यफल प्राप्त किया। इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति जाने या अनजाने में भी शिवरात्री का पर्व विधिवत करे तो वह पुण्यफल प्राप्त करता है। अग्निपुराण में भी सुन्दरसेनक नामक बहेलिये का उल्लेख किया गया है|

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

श्री हनुमान चालीसा और उसका सम्पूर्ण अर्थ - Hanuman Chalisa

जय हनुमान जी की. भक्तों, आपको श्री हनुमान चालीसा के बारे में तो पता ही होगा। हो सकता है आप इसका जाप भी करते हों. परन्तु, क्या आपको चालीसा की सभी दोहों का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो आप नीचे लिखे हुए दोहे और उनके अर्थ के बारे में जान सकते हैं. Hanuman Chalisa ka matlab – What is the meaning of Hanuman Chalisa? दोहा 1 : श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि | बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि || अर्थ: “शरीर गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।” दोहा 2 : बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार || अर्थ: “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।” दोहा 3 : जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥ अर्थ: “श्री हनुमान जी!आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कप