Skip to main content

क्या आप भी भूत प्रेत के प्रभाव से पाना चाहते है मुक्ति ?

आज के समय में कुछ लोग भूत प्रेत में विश्वास रखते है और कुछ लोगों के लिए ये बातें फिजूल की है और जो लोग इन बातों में विश्वास रखते है वे भूत प्रेत आत्माओं से बहुत पीड़ित है| पशुयोनि, पक्षियोनि और मानव योनि में जीवन व्यवीत करने के पश्चाप, कुछ मान्यताओं के अनुसार मृत आत्मायें एक अदृश्य ताकतवर भूत प्रेत की योनि में प्रवेश करती है, जो की एक भयभीत विषय है|

भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है। इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है। यह बहुत दुखी और चिड़चिड़े होते है, कभी घरों में और कभी जंगल में भटकते रहते है और हर समय मुक्ति दिलाने वाले की खोज में लगे रहते है|

क्या आपको भी लगता है रात में डर और कुछ अजीब सी आवाज़े सुनाई देती हो परन्तु पीछे मुड़ने पर कोई न दिखें| यदि आपके साथ कुछ ऐसा होता है और

आप पाना चाहते है मुक्ति तो नीचे दिए गए उपायों को धयान दें-

  1. अगर आपके ऊपर भूत प्रेत का प्रभाव है तो शनिवार के दिन दुपहर में सवा किलो बाजरे का दलिया बना ले और उसमे थोड़ा गुड़ मिलाकर एक मिटटी की हांडी में रखकर सूर्य ढलने के बाद पूरे शरीर पर बायें से दायें घूमते हुए नजर उतरवाएं, और बिना किसी को बताये हांड़ी को चौराहे पर रख दें और घर लौटते समय पीछे मुड़ कर न देखें और न ही किसी से बात करे|
  2. जिस व्यक्ति के ऊपर भूत प्रेत का साया मंडरा रहा हो उसके गले में ॐ या रुद्राक्ष का अभिमंत्रित लॉकेट पहनाएं और सिर पर चन्दन, केसर और भभूत का तिलक करे और हाथ में मोली बांध ले|
  3. हिन्दू शास्त्र में प्रेत आत्माओं को दूर भगाने के लिए के लिए हनुमत मंत्र का उच्चारण दिया गया है, प्रतिदिन कम से कम पाँच बार जाप करने से मिलेगा लाभ | मंत्र है-ओम ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रंू ह्रैं ओम नमो भगवते महाबल पराक्रमायभूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षिणी-पूतना मारी-महामारी,यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम् क्षणेन

    हन हन भंजय भंजय मारय मारय

    शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतारहुं फट् स्वाहा।

  4. मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करने से मन का भय खत्म होता है|
  5. आत्माओं से मुक्ति पाने के लिए एक निम्बू लें और उसे चार भागों में कांट लें और उनपर चार-चार बार निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करके उसे चारों कोनों में फ़ेंक दें|

मंत्र: आई की, माई की, आकाश की, परेवा पाताल की। परेवा तेरे पग कुनकुन। सेवा समसेर जादू गीर समसेर की भेजी। ताके पद को बढ़ कर, कुरु-कुरु स्वाहा।

6. बहेड़े का साबुत पत्ता या उसकी जड़ लाएं और धूप, दीप और नवैद्य के साथ उसकी विधिवत पूजा करें। उसके बाद 108 बार निम्नलिखित मंत्र का जाप करें। इस तरह का अनुष्ठान कुल 21 दिनों तक सूर्यादय से पहले करें।

मंत्र हैः– ओम नमः सर्वभूतधिपत्ये ग्रसग्रस शोषय भैरवी चाजायति स्वाहा।।

जाप की पूर्णाहुति अर्पण के बाद अभिमंत्रित हो चुके पत्ते या जड़ से एक ताबीज बनाएं जिससे की प्रेतबाधा दूर हो सकती है। उसे गले में पहनाने से जादूटोना और प्रेतबाधा का असर नहीं होता है। यह उपाय विशेषकर बच्चों के लिए किया जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

श्री हनुमान चालीसा और उसका सम्पूर्ण अर्थ - Hanuman Chalisa

जय हनुमान जी की. भक्तों, आपको श्री हनुमान चालीसा के बारे में तो पता ही होगा। हो सकता है आप इसका जाप भी करते हों. परन्तु, क्या आपको चालीसा की सभी दोहों का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो आप नीचे लिखे हुए दोहे और उनके अर्थ के बारे में जान सकते हैं. Hanuman Chalisa ka matlab – What is the meaning of Hanuman Chalisa? दोहा 1 : श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि | बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि || अर्थ: “शरीर गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।” दोहा 2 : बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार || अर्थ: “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।” दोहा 3 : जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥ अर्थ: “श्री हनुमान जी!आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कप