10 सर क्यों थे रावण के? सच जान कर आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे

लोग  रावण को आज भी बुराई का प्रतिक के रूप में जानते है | रावण दहन इसका ज्वलंत उदाहरण है | विजयादशमी के दिन जब लोग रावण दहन होते देखते है तो निश्चय ही सभी के मन में ये विचार जरूर आता है की क्या ये संभव है की किसी के दस सर भी हो सकते हैं | हालाँकि बुजुर्गों के अनुसार रावण के दस सर दस बुराईयों के प्रतिक हैं | काम, क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष, घृणा, पक्षपात, अहंकार, व्यभिचार, धोखा ये सभी रावण के दस सरों के रूप में दर्शाए गए हैं |

रावण महर्षि विश्रवा और कैकसी नामक राक्षसी जोकि राक्षस के राजा महाराज सुमाली की बेटी थी| रावण को अपने पिता महर्षि विश्रवा से वेद-शास्त्रों का ज्ञान मिला था और अपनी माता कैकसी से राक्षसी प्रवृति मिली थी | रावण का एक दूसरा रूप भी है जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं |

रावण ब्राह्मण कुल से था और उससे प्रकांड विद्वान् सारे संसार में नहीं था | रावण एक कुशल वीणा वादक भी था | कहा जाता है की रावण से शास्त्रार्थ करने का साहस उस समय के बड़े से बड़े पंडित में भी नहीं था | और रावण जब वीणा बजाता था तो क्या मनुष्य क्या राक्षस यहाँ तक की देव लोक की अप्सराएं भी स्वयं को रोक नहीं पाती थी | और रावण की वीणा की तान सुन कर मंत्रमुग्ध हो कर नृत्य करने लगती थी | रावण बहुत ही बड़ा शिवभक्त था | रावण की गर्जना सुनकर बड़े से बड़े योधा के भी पसीने छूट जाते थे | रावण में अद्भुत बल था और जब तक किष्किन्धा नरेश बाली से रावण का सामना नहीं हुआ तब तक रावण अपराजित था |

 

लंकानरेश रावण के दो भाई और एक बहन थी जिनका वर्णन रामायण में भी है | रावण के बाद कुम्भकरण जोकि छह महीने सोने और छह महीने जागने के लिए मशहूर था | सबसे छोटा विभीषण जिसने रावण का साथ छोड़ कर प्रभु राम का साथ दिया था | और आखिर में बहन शूर्पनखा जिसने वनवास के दौरान लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था और क्रोधित हो कर लक्ष्मण ने शूर्पनखा के नाक और कान काट लिए थे |

रावण शिव का अनन्य भक्त था रामायण में कई जगह  इसका उल्लेख भी किया गया है | लंका के बारे में एक दन्तकथा प्रचलित है की शिव ने लंका का निर्माण देवी पार्वती के कहने पर कराया था परन्तु गृहप्रवेश के समय रावण ने भगवान् शिव से लंका दक्षिणा में मांग ली थी | ब्राह्मण होने के कारण शिव रावण को मना नहीं कर सकते थे और मजबूरीवश उन्होंने रावण को लंका दान में दे दी थी | रावण की शिवभक्ति से प्रसन्न हो कर भगवान् शिव ने उसे कई वरदान भी दिए थे | एक बार रावण भगवान् शिव की अराधना कर रहा था भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने दस बार अपना सर काट कर भगवान् शिव को चढ़ा दिया था | रावण के भक्तिभाव से प्रसन्न हो कर भगवान् ने रावण को दशानन होने का वरदान दिया और साथ ही साथ ये भी वरदान दिया की रावण के प्राण तब तक कोई नहीं ले पायेगा जब तक की उसकी नाभि पर प्रहार नहीं करता |

रावण के प्राण उसकी नाभि में था और रामायण के युद्ध में प्रभु राम ने कई बार रावण का सर काट दिया कई कोशिश की फिर भी रावण को नहीं मार पाए | अंततः विभीषण के कहने पर प्रभु राम ने रावण की नाभि में बाण मारा तब जाकर रावण की मृत्यु हुई |

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