Skip to main content

क्या आप भी अपने विदेश जाने के सपने को पूरा करना चाहते है, तो करें ये उपाय

आज के समय में विदेश जाने का सपना हर एक युवा रखता है, विदेश का नाम सुनकर ही उनकी आँखों में एक अलग सी चमक देखने को मिलती है| लोग विदेश घूमने, पढ़ने, व्यापार करने के लिए जाते है और वहाँ जाकर अपना और अपने देश का नाम रोशन करना चाहते है| लेकिन यह कहना मुश्किल होगा कि उन्हें वहाँ सफलता मिलेगी या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए वे ज्योतिष की मदद लेते है|

प्राचीन काल में विदेश यात्रा या वहां जा कर बसना हिंदू समाज में बहुत खराब माना जाता था और विदेशियों के साथ संपर्क रखने वाले व्यक्ति को समाज से बाहर कर दिया जाता था| परंतु आज समय बदल चुका है, अब विदेश यात्रा गौरव की बात मानी जाती है|

ज्योतिषी विद्या से किसी व्यक्ति की कुंडली में कुछ भाव, राशि तथा ग्रह उस व्यक्ति को विदेश यात्रा कराने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| इनमें अगर आपसी संबंध हों, तो यात्राएं होती हैं| यात्रा कराने वाली राशियां: मेष, कर्क, तुला और मकर राशियां होती है| यदि किसी व्यक्ति के ज्यादा से ज्यादा ग्रह इन राशियों में हों, तो वह बहुत यात्राएं करता है| परन्तु कही बार किसी कारणवश आप अपने विदेश जाने के सपने को पूरा नहीं कर पातें| किसी का वीसा नहीं बन पाता तो कोई आर्थिक तंगी के कारण नहीं जा पाता|

अगर आप भी विदेश जाना चाहते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी असफल हो रहे तो आप अपने विदेश जाने के सपने को सच करने के लिए कुछ अचूक उपाय कर सकते है|

1) विदेश जाना चाहते हैं तो अपनी इस इच्छा को सच करने के लिए करें ये उपाय| विदेश जाने के लिए साल में आने वाली किसी भी संक्रांति के दिन सफेद तिल एवं गुड़ लेकर एक मिटटी के प्याले में डाल दें| अब इस प्याले को पीपल के स्वयं गिरे हुए पत्ते से ढक लें| शाम को सूर्य के ढलने के समय इस प्याले को आक के पौधे की जड़ में रख दें और इसके बाद बिना पीछे मुड़े सीधा घर को आ जाए| घर पहुंचने पर पानी में थोडा केसर मिलाए और स्नान करें| इस उपाय को करने के बाद अपने गुरु का नाम लें, आपको विदेश जाने में जल्द ही सफलता मिलेगी|

2) अगर आपका विदेश जाने का सपना असफल वीसा के बनने में बार बार बाधा आने के कारण हो रहा है तो इस बाधा को दूर करने के उपाय से आपका सपना सफल हो सकता है| इस उपाय को शुक्ल पक्ष के शुक्रवार से प्रारम्भ करें, एक लकड़ी का तख्ता लें और उस पर लाल वस्त्र बिछा लें अब इस तख़्त पर महालक्ष्मी की मूर्ति को स्थापित करें, इसके बाद तख़्त के आगे एक देशी घी का दिया जलाएं और अपने मुख को पश्चिम दिशा की ओर करके बैठें|

अब एक शंख लें और उस पर केसर को घोलकर स्वास्तिक का चिन्ह बना लें| अब इस शंख को महालक्ष्मी के बगल में रख दें, इसके बाद महालक्ष्मी की और शंख की इत्र, फुल, धूप, दीप द्वारा पूजन करें| पूजा करने के बाद महालक्ष्मी को भोग लगाए| अब एक स्फटिक की माला लें और नीचे दिए गए मन्त्र का जप करें|

मंत्र है: ॐ अनंग वल्लाभाये विदेश गमनार्थ कार्य सिध्यर्थे नम:

3) विदेश जाने के सपने में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए श्री राम के परम भक्त हनुमान जी की पूजा करें| प्रतिदिन हनुमान जी के मंदिर में जाएं, मूर्ति के आगे दीपक जलाएं और उनसे प्रार्थना करें| प्रार्थना करने के बाद हनुमान चालीसा पढ़ें| हनुमान चालीसा को पढने के बाद हनुमान जी की मूर्ति की तीन परिक्रमा करें और ध्यान रखें कि हनुमान जी की मूर्ति आपके बाएं हाथ की ओर हो| हनुमान जी की पूजा करने से आपकी विदेश जाने की मनोकामना जल्द ही सफल होगी|

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

श्री हनुमान चालीसा और उसका सम्पूर्ण अर्थ - Hanuman Chalisa

जय हनुमान जी की. भक्तों, आपको श्री हनुमान चालीसा के बारे में तो पता ही होगा। हो सकता है आप इसका जाप भी करते हों. परन्तु, क्या आपको चालीसा की सभी दोहों का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो आप नीचे लिखे हुए दोहे और उनके अर्थ के बारे में जान सकते हैं. Hanuman Chalisa ka matlab – What is the meaning of Hanuman Chalisa? दोहा 1 : श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि | बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि || अर्थ: “शरीर गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।” दोहा 2 : बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार || अर्थ: “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।” दोहा 3 : जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥ अर्थ: “श्री हनुमान जी!आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कप