4000 वर्ष पूर्व गुम हुई नदी आखिर मिल ही गयी – यह रहे सबूत – आपने कभी सोचा भी नहीं होगा

जब भी भारत में नदियों का जिक्र होता है तो दिमाग में जो नाम आते हैं वो हैं गंगा, यमुना, सरस्वती| गंगा कई राज्यों में  बहती है वही यमुना भी देश की राजधानी दिल्ली में अस्तित्व में है परन्तु सरस्वती की धारा के दर्शन कहीं नहीं होते| क्या सरस्वती काल्पनिक नदी है? जी नहीं सरस्वती के अस्तित्व के प्रमाण मौजूद हैं कहा जाता है की सरस्वती नदी के तट पर ही ऋगवेद की रचना की गयी थी|

4000 वर्ष पूर्व गुम हुई नदी आखिर मिल ही गयी - यह रहे सबूत - आपने कभी सोचा भी नहीं होगा

आज से 4000 साल पहले ये धरती पर से विलुप्त हो गयी थी और कहीं भी सरस्वती नदी की धारा न होने की वजह से लोग इस नदी को भूल से गए थे| परन्तु अभी हाल के समय में ही सरस्वती नदी के होने के प्रमाण मिले थे और उसके बाद सूबे की सरकार का ध्यान सरस्वती नदी के मार्ग की तलाश करने की ओर गया| राज्य सरकार ने एक बोर्ड का गठन किया और सरस्वती नदी के मार्ग की खोज का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया|

4000 वर्ष पूर्व गुम हुई नदी आखिर मिल ही गयी - यह रहे सबूत - आपने कभी सोचा भी नहीं होगा

इसी क्रम में यमुनानगर जिले के मुगलवाली गाँव के समीप खुदाई के दौरान सिर्फ आठ फीट की खुदाई से पानी के श्रोत का पता चला| माना जाता है की सरस्वती नदी पृथ्वी पर से विलुप्त नहीं हुई थी बल्कि उसका बहाव भूमिगत हो गया था अर्थात नदी का बहाव धरती के अन्दर हो गया था| पहली बार सरकार द्वारा गठित समिति को सरस्वती नदी का सही मार्ग मिला है और इससे सूबे में उत्साह का माहौल है|

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साथ ही सरस्वती विरासत विकास बोर्ड के प्रभारी के अनुसार वो पूरी कोशिश कर रहे हैं की इसके जल मार्ग को बरकरार रखने के लिए मानसून के समय में जरूरी कदम उठाया जाएगा| साथ ही साथ आगे चल कर आदि बद्री क्षेत्र में इस जलमार्ग पर बाँध बनाने पर भी विचार किया जा रहा है ताकि भविष्य में पूरे साल इस नदी में पानी बरकरार रखा जा सके और हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को सरस्वती नदी दिखा सकें|हरियाणा के माननीय मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल खट्टर ने इस अति महत्वकांक्षी परियोजना के लिए 50 करोड़ रूपए आवंटित किया है ताकि इस परियोजना की सफलता में पैसों की कमी की वजह से कोई रकावट न आये| माननीय मुख्यमंत्री जी ने ये भी कहा की सरस्वती नदी हिन्दुओं के लिए नदी ही नहीं बल्कि एक देवी के रूप में पूजी जाती रही है और इस परियोजना से 125 करोड़ भारतवासियों की भावनाएं भी जुडी हैं|

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सरस्स्वती नदी के अस्तित्व को साबित करने के लिए ये प्रमाण बहुत काफी है की सरस्वती नदी आज से 5000 वर्ष पूर्व गंगा और यमुना की तरह अविरल बहती थी| ऋगवेद के अनुसार इस नदी का मार्ग हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात और तत्कालीन पाकिस्तान में था सरस्वती पूर्व दिशा में यमुना से निकलकर पश्चिम दिशा में सतलज नदी में जाकर मिलती थी| इस बात को मान कर आज़ादी के बाद कई वर्षों से इस महत्वकांक्षी परियोजना पर काम चल रहा था और अब जाकर इसमें सफलता मिली है|

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