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कृष्ण ने सुर्यपुत्र कर्ण के वध में इंद्रपुत्र अर्जुन का साथ क्यूँ दिया था

महाभारत की कथा अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए है कुछ रहस्यों के बारे में बहुत कम लोगों को पता है| जैसे की कर्ण सुर्यपुत्र थे फिर भी विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने कर्ण का वध करने में देवराज इंद्र के धर्मपुत्र अर्जुन का साथ क्यूँ दिया? महाभारत के अनुसार कर्ण ने पांडवों के विरुद्ध कौरवों का साथ दिया था| अधर्मियों का साथ देने की वजह से श्री कृष्ण ने कर्ण के वध में अर्जुन का साथ दिया था| परन्तु कर्ण से अर्जुन और श्री कृष्ण का बैर पिछले जन्म का था|

आप इस तथ्य को सुन कर अचंभित रह गए होंगे की ऐसा कैसे हो सकता है| आइये आपको बताते हैं कर्ण, अर्जुन और श्री कृष्ण के पिछले जन्म की कथा के बारे में| त्रेता युग में एक बड़ा ही क्रूर और चालाक राक्षस था दम्बोधव उसने अमरत्व प्राप्ति के उद्देश्य से सूर्यदेव की तपस्या करनी आरम्भ की उसकी तपस्या से सूर्यदेव प्रसन्न हो गए और मंवान्क्षित वर मांगने को कहा| उसने सूर्यदेव से अमरत्व का वरदान माँगा परन्तु उन्होंने कहा की जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है कोई दूसरा वर मांगो|

तब उसने कहा की मुझे हज़ार कवच प्रदान करें और उसे भेदने की शक्ति केवल उस व्यक्ति में हो जिसने हज़ारों वर्षों तप किया हो| और कवच के टूटते ही उसकी मृत्यु हो जाए और जब तक सारे कवच ना टूट जाएँ तब तक मेरी मृत्यु ना हो| सूर्यदेव जान रहे थे की दम्बोधव इस वरदान का दुरूपयोग करेगा परन्तु सूर्यदेव ने मजबूरीवश दम्बोधव को उसका मनचाहा वरदान दे दिया| वरदान पाकर दम्बोधव निरंकुश हो उठा और वहां के लोगों पर तरह तरह के अत्याचार करने लगा| सूर्यदेव से प्राप्त वरदान की वजह से दम्बोधव को सहस्त्रकवच के नाम से भी जाना जाने लगा|

वहीं दक्ष प्रजापति की पुत्री मूर्ति का विवाह ब्रम्हा जी के पुत्र धर्म से हुआ था| उन्होंने अपने विवाह के समय ही भगवान विष्णु से धरती पर आकर सहस्त्रकवच का अंत करने की प्रार्थना की तब भगवान विष्णु ने कहा की सही समय आने पर मैं अवश्य उसका अंत करूँगा| कुछ समय बाद मूर्ति और धर्म के घर जुड़वाँ बालकों का जन्म हुआ जिनके शरीर तो दो थे परन्तु आत्मा एक थी| भगवान विष्णु ने दो शरीर में अवतार लिया था जिनके नाम नर और नारायण रखे गए दोनों का तेज बड़ा ही अलौकिक था| समय के साथ दोनों बड़े होने लगे एक दिन दम्बोधव उनके नगर के वन में आ पहुंचा|

तब नर वन में पहुंचे उन्हें देखते ही दम्बोधव को डर सा लगा परन्तु फिर भी उसने ढिठाई से कहा की तुम्हे मुझसे भय नहीं लगता| तब नर ने कहा मैं तुमसे युद्ध करने आया हूँ यह सुनकर दम्बोधव हंसने लगा और अपने वरदान की बात बतायी तो नर ने कहा कीम दो शरीर एक प्राण हैं और मेरा भाई नारायण मेरे बदले तप कर रहा है| दोनों में युद्ध आरम्भ हो गया और 1000 वर्ष पूरा होते ही उसका एक कवच टूट गया वरदान के अनुसार नर की मृत्यु हो गयी| कुछ देर बाद उसने देखा की नर वापस आ रहा है तो वह आश्चर्यचकित हो उठा तब नर के जुड़वाँ भाई नारायण ने बताया की मुझे तपस्या से महामृत्युंजय मन्त्र की प्राप्ति हुई है|

यह कह कर उसने मन्त्र के बल पर नर को जीवित कर लिया अब नर तपस्या करने गए और नारायण ने दम्बोधव से युद्ध आरम्भ कर दिया| यही चक्र 999 बार चला जब दम्बोधव ने देखा की उसका आखिरी कवच बचा है तब उसने वहां से भाग कर सूर्यदेव की शरण में आ गया| तब सूर्यदेव ने शरणागत की रक्षा कर के अपना धर्म पूरा किया और अगले जन्म में नर ने अर्जुन और नारायण ने श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया| तथा दम्बोधव का दूसरा जन्म कर्ण था जो की अपने आखिरी कवच के साथ पैदा हुआ था| देवराज इंद्र ने अपने धर्म अर्जुन को बचाने के लिए ब्राह्मण का भेष बना कर कर्ण से उसका कवच मांग लिया था|

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