नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के इस दांव ने उड़ाई विरोधियों की नींद। आखिर वह है क्या?

आठ नवंबर के बाद देश में सबसे बड़ा मुद्दा नोटबंदी का हो गया है। अमीर से फकीर तक सब इससे प्रभावित हुए हैं। इसलिए राजनीति के केंद्र में भी नोट की चोट शामिल है। भाजपा नोटबंदी करने वाली है इसलिए इसे भुनाने और फायदा उठाने की सबसे बड़ी चुनौती उसी के सामने है। वह अपनी हर रैली में इसे ही हथियार बनाकर पेश कर रही है। जबकि बसपा, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, सपा और कांग्रेस इसके नुकसान को गिनाने में जुटे हुए हैं। इन पार्टियों का सोशल मीडिया विंग युवाओं को भी इसके नुकसान बता रहा है। सबसे ज्‍यादा मुखर अरविंद केजरीवाल हैं जिन्‍होंने इसकी परेशानियों को भुनाने के लिए रैलियां शुरू कर दी हैं। जाहिर है यूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव नोटबंदी के नफे-नुकसान पर लड़ा जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुरादाबाद रैली में अपने भाषण से गरीबों को समझने की कोशिश की। जिसमें उन्‍होंने जनधन खातों में जमा कराई गई रकम वापस न करने की अपील करते हुए कहा कि कोई बोले तो कह देना कि मोदी को पत्र लिख दूंगा। बता दें कि भाजपा के एक धड़े को इस बात से परेशानी थी कि यदि जनधन खाताधारकों पर कार्रवाई की गई तो पार्टी की छवि गरीब विरोधी बन जाएगी और चुनाव में नुकसान होगा। इसीलिए पार्टी ने प्रधानमंत्री के जरिए नए दांव से विपक्षियों के लिए परेशानी खड़ी कर दी। जानकारों का कहना है कि कुछ लोग भले ही प्रधानमंत्री के इस बयान की आलोचना करें लेकिन पीएम ने इस दांव से गरीबों को खुश कर दिया है।

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्‍ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने तो नोटबंदी के दौरान हुई मौतों का मसला उठाकर इससे परेशान वर्ग को साधने की कोशिश रैलियों के जरिए शुरू की है। उन्‍होंने मेरठ से इसकी शुरुआत कर दी है। पंजाब में भी उनकी पार्टी लोगों की परेशानी को सुन रही है। बता दें कि पंजाब में नोटबंदी से आलू किसानों का भारी नुकसान हुआ है। दूसरी सबसे ज्‍यादा परेशान होने वाली पार्टी बसपा है। पार्टी प्रमुख मायावती इसे लेकर रोजाना बयान दे रही हैं। राज्‍यसभा में सरकार को घेर रही हैं।

उन्‍होंने कहा है कि नोटबंदी के कारण 90 प्रतिशत आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा है। मोदी ने 90 फीसदी जनता को कंगाल और फकीर बना दिया। जनता को विधानसभा चुनाव में ब्‍याज सहित इसका बदला लेना चाहिए। यूपी की सत्‍ता संभाल रही समाजवादी पार्टी मसले पर ज्‍यादा नहीं बोल रही है, लेकिन अखिलेश यादव के दांव ने भाजपा, बसपा को परेशान कर दिया है। यूपी के सीएम अखिलेश यादव ने नोटबंदी के साइड इफेक्‍ट से मरने वालों के परिजनोंं को दो-दो लाख रुपये की सहायता देने का एलान करके सियासी बढ़त लेने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि गांवों में रहने वाली आधी से ज्यादा आबादी को लेन-देन के डिजिटल तरीकों के बारे में बताने के लिए केंद्र सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है।

सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रो. एके वर्मा कहते हैं कि चुनाव में सबसे अहम मुद्दा तो नोटबंदी ही होगा। सभी दल अपने-अपने हिसाब से इसे उठा और बता रहे हैं। लेकिन इस बदलाव का सही असर जनवरी 2017 में देखने को मिलेगा। उसी के बाद यह तय हो पाएगा कि इसका राजनीतिक नफा-नुकसान कौन उठाएगा। अभी न तो इस फैसले से ज्‍यादा खुश होने की जरूरत है और न ही दुखी होने की।

भाजपा के प्रदेश अध्‍यक्ष केशव प्रसाद मौर्य कहते हैं कि सत्ता बदलने के बाद हम व्यवस्था बदलेंगे। 500 और 1000 के नोटों पर लिया गया निर्णय व्यवस्था बदलने की दिशा में पहला कदम है। लूट के पैसों से गरीबों का वोट खरीदने का काम बसपा करती थी और सपा गुंडई के बल पर बूथ लूटने का काम करती थी, इन दोनों दलों को नोटबंदी के फैसले से बड़ा झटका लगा है।

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