यमयातना से मुक्ति देने वाली यमुनाजी

वृन्दावन धाम को वास भलो, जहां पास बहै यमुना पटरानी ।
जो जन नहाय के ध्यान धरै, वैकुण्ठ मिलै तिनको रजधानी ।।
चारहूं वेद बखान करै अस संत, मुनीश, गुणी मनमानी ।
यमुना यमदूतन टारत है, भव तारत है श्रीराधिका रानी ।।

श्रीयमुनाजी का प्राकट्य और स्वरूप

श्रीराधा माधव अंग ते प्रगट भई इक वाम ।
नख ते कटि लौं राधिका, कटि ते शिख लौं श्याम ।।

यमुनाजी का प्राकट्य श्रीठाकुरजी और स्वामिनीजी के श्रीअंग से हुआ है, इसलिए चरणों से कमर तक श्रीराधा और कमर से सिर तक श्यामसुन्दर का स्वरूप है –

श्याम संग श्याम ह्वै रही श्री यमुने ।
सुरति श्रम बिन्दु ते, सिंवु सी बह चली ।
मानो आतुर अली रहे न भवने ।।

अष्टछाप के कवि गोविन्दस्वामी का कहना है कि यमुनाजी के जल का रंग श्याम है और भगवान श्रीकृष्ण का रंग भी श्याम है इस प्रकार श्याम के साथ वे श्यामा हो रही हैं । यमुनाजी का प्राकट्य ‘श्रम जल बिन्दु’ से माना गया है । भगवान श्रीकृष्ण जब स्वामिनीजी (श्रीराधा) के साथ रास विहार करते हैं, उस समय जो पसीना ठाकुरजी और श्रीराधा को आता है उसे ही ‘श्रम जल बिन्दु‘ कहा गया है और वही यमुनाजी का स्वरूप है । वहां से वह पृथ्वी पर जल रूप में पधारीं तो अपने भवन में नहीं रहीं, मानो अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण से मिलने के लिए अति आतुरता के साथ दौड़ी जा रही हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की दुर्लभ रेणु (धूल) प्रदान करती हैं यमुनाजी

श्रीयमुनाजी का गोलोक में नाम विरजा नदी (सखी) है, उसमें ठाकुरजी स्नान करते व जल विहार करते हैं । जब वे यमुना रूप में भूमि पर आती हैं तो अपने साथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमल की रेणु (धूलि) ले आती हैं । यमुनाजी में जल कम व रेणु ज्यादा होती है । इस प्रकार जो वैष्णव यमुनाजल में स्नान, उसका सेवन व पूजन करते हैं उनको भगवान के चरणकमलों की दुर्लभ रेणु सहज ही प्राप्त हो जाती है । इससे पुष्टि मार्गीय वैष्णवों को अलौकिक दिव्य देह की प्राप्त होती है जिससे वह भगवान की दिव्य लीलाओं में भाग लेने का अधिकारी हो जाता है ।

यम की यातना से मुक्ति देने वाली यमुनाजी

यमुनाजी सूर्यपुत्री हैं और यमराज सूर्यपुत्र हैं । अत: यमुनाजी यमराज की बहिन हैं । यमुनाजल का भावपूर्वक पान करने से यमयातना नहीं होती है । यमुनाजी के नाम का यही अर्थ है कि यम + नाहें अर्थात् यमराज की हिम्मत नहीं कि वे यमुनाजी के भक्तों को यमलोक में ले जाकर नरक में डाल दें। यमराज अपनी बहिन के पुत्रों को किस प्रकार नरक में डाल सकते हैं?

श्रीगदाधरदास ने लिखा है–’ऊजर देश कियो भ्राता कौ, तुम परसत उत कोऊ न जाई ।’ यमुनाजी ने अपने भाई यमराज का घर उजाड़ दिया है । यमुनाजी के सेवन से जीव यमलोक में जाता ही नहीं । अत: यमलोक सूना हो रहा है । यद्यपि यमुनाजी पतितों का खुलकर पक्षपात करती हैं, फिर भी वे आनन्दकन्द श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय लगती हैं ।

कहते हैं कि यमराज ने अपनी बहिन यमुना को वर दिया था कि जो भाई-बहिन यमद्वितीया (कार्तिक शुक्ल द्वितीया) को यमुना-स्नान करेंगे उन्हें यमयातना नहीं भोगनी पड़ेगी । इस दिन मथुरा में विश्रामघाट पर भाई-बहिनों द्वारा हाथ पकड़ कर यमुना-स्नान करने का बहुत माहात्म्य हैं ।

यमुनाजी की कृपा से लौकिक-अलौकिक सभी सुखों की प्राप्ति
भक्त प्रतिपाल जंजाल टारें ।
अपने रस रंग में संग राखत सदा सर्वदा,
जोई श्रीयमुनाजी को नाम उच्चारें ।।
इनकी कृपा अब कहां लगि बरनियें,
जैसे राखत जननी पुत्र बारे ।
‘श्रीविट्ठल’ गिरिधरन संग विहरत,
भक्त को एक छिन ना बिसारें ।

पुष्टि मार्गीय भक्तों का पालन यमुनाजी ही करती हैं । अपने भक्तों की विपत्तियों का निवारण वे पहिले से ही कर देती हैं और उनके सांसारिक जंजालों को हटाकर अपने रस रंग में रंग देती हैं । जो वैष्णव सदैव यमुनाजी के नाम का उच्चारण करते रहते हैं, उन्हें वे अपने समान श्रीकृष्ण की लीलाओं के रस में डुबोए रहती हैं । जिस प्रकार माता अपने अबोध बालक के लालन-पालन का ध्यान रखती है उसी प्रकार यमुनाजी पुष्टि मार्गीय भक्तों का सम्पूर्ण दायित्व अपने ऊपर ले लेती हैं । भगवान श्रीकृष्ण के साथ लीला विहार करते समय भी यमुनाजी अपने भक्तों को अपने साथ रखकर उसी रस का दान प्रभु से करवाती हैं जिस रस का पान वह स्वयं करती हैं ।

यमुनाजी के बिना नहीं होती पुष्टि भक्ति की प्राप्ति

यमुनाजी अलौकिक निधि भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति कराने वाली हैं । जो वैष्णव अष्टप्रहर यमुनाजी के नामों का उच्चारण करता है उसे वह भगवान की निकुंज लीला में प्रवेश करा देती हैं । क्योंकि भगवान श्रीराधाकृष्ण यमुनाजी के तट पर ही रास विहार करते हैं । रास लीला में प्रवेश केवल गोपियों को है किन्तु कृष्णप्रिया श्रीयमुनाकी कृपा से यह अलौकिक फल भी वैष्णव प्राप्त कर लेता है कि उसे भगवान का दिव्य वेणुनाद भी सुनाई देने लगता है ।

भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला में प्रवेश और उसका दर्शन—यही पुष्टि भक्ति का फल है जिसकी प्राप्ति यमुनाजी की कृपा से सहज ही हो जाती है ।

यमुनाजी का ध्यान

ॐ श्यामामम्भोजनेत्रां सघनघनरुचिं रत्नमंजीरकूजत्
कांचीकेयूरयुक्तां कनकमणिमये बिभ्रतीं कुण्डले द्वे ।
भ्राजच्छ्रीनीलवस्तां स्फुरदमलचलद्धारभारां मनोज्ञां
ध्यायेन्मार्तण्डपुत्रीं तनुकिरणचयोद्दीप्तदीपाभिरामाम् ।।

अर्थात्—जो श्याम वर्ण की और सोलह वर्ष की अवस्था वाली हैं, जिनके नेत्र खिले हुए कमल की शोभा को छीन लेते हैं, मेघ के समान जिनकी नील कान्ति है, जो रत्नों से बने और बजते हुए नूपुर और झनकारती हुई करधनी व केयूर आदि आभूषण पहने हैं, जिनके कानों में सोने और मणियों के कुण्डल हैं, चमकती हुई नीली साड़ी पर गजामुक्ता के हार पहने बहुत सुन्दर दिखाई देती हैं, जिनके शरीर की आभा जलती हुई दीपमाला के समान है, उन सूर्यनन्दिनी यमुनाजी का मैं ध्यान करता हूँ ।

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