श्री राम ने क्यों किया था देवी सीता का त्याग

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने वनवास से लौटने के बाद अपने छोटे भाई भरत के बार बार निवेदन करने पर वहां का राज्यभार अपने हाथों में ले लिया| वहां की प्रजा अपने राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी को राजगद्दी पर बैठा देख कर बड़ी प्रसन्न हो गयी| पूरे राज्य में ख़ुशी के गीत गाये जा रहे थे हर ओर दीपक जलाये गए थे हर कोई एक दुसरे को मिठाईयां बाँट रहा था| श्री राम के राज्य में सारी जनता ख़ुशी ख़ुशी रह रही थी उनके राज्य में न तो कोई अपराध होता था न ही किसी को किसी चीज़ की कमी रहती थी|

इसी प्रकार ख़ुशी ख़ुशी दिन बीत रहे थे श्री राम भी अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करते थे और समय समय पर उनका हाल चाल लेते रहते थे| उन्होंने अपने द्वारपालों से साफ़ शब्दों में कह रखा था की कोई भी याचक मेरे द्वार से खाली हाथ न लौटे| साथ ही अपनी राज्य की जनता को बोल रखा था की जब भी किसी को कोई जरूरत हो वह बेहिचक उनसे मिलने आ सकता था| श्री राम कई बार भेष बदल कर अपने राज्य में आम जनता के बीच जाकर उनके दुखों और कष्टों के बारे में जानकारी लेते रहते थे|

इसी क्रम में एक दिन जब भगवान् श्री राम भेष बदल कर अपने राज्य की जनता के बीच गए तो उन्हें चौराहे पर लोगों की भीड़ दिखी| उत्सुकता वश श्री राम भी वहाँ जा पहुंचे ताकि पता चल सके की भीड़ के जमा होने के पीछे क्या कारण था| वहाँ पहुँचने पर उन्होंने देखा की एक धोबी अपनी पत्नी से झगडा कर रहा था| प्रभु श्री राम भी रुक कर कारण जानने के लिए वहीँ खड़े हो गए धोबी ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया था| जबकि उसकी पत्नी निरपराध थी उसकी कोई गलती नहीं थी| लोगों ने जब बीच बचाव करते हुए उसे समझाने की कोशिश की तो उसने यह कह कर सबका मुंह बंद कर दिया की मैं कोई श्री राम थोड़े ही ना हूँ| जो रावण के पास 12 वर्ष रहने के बाद भी सीता को अपना लिया|

मुझे अपना सम्मान ज्यादा प्यारा है मैं पर पुरुष के पास रह कर आई हुई स्त्री को कभी अपना नहीं सकता| यह सुनकर श्री राम मन ही मन विचलित हो उठे और वहां से सीधा अपने राजमहल में वापस आ गए| रावण के मरने के बाद भी उन्हें रोज रात को सपने में रावण का सर दिखता था जो की श्री राम पर अट्टहास कर रहा होता था की तुमने मेरे द्वारा हरण की हुई स्त्री को अपना लिया| हालांकि राम को इस बात का पता था की रावण ने सीता का नहीं बल्कि माया सीता का हरण किया था और सीता बिलकुल पवित्र थी| परन्तु लोक लाज के भय से उन्होंने देवी सीता का त्याग कर दिया था|

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