क्यों गुरु के सेवा करने पर कर्ण को वरदान की जगह मिला श्राप

महाभारत की कथा के कई अनछुए पहलु हैं आज हम आपको रूबरू करते हैं ऐसी ही एक घटना से जिसके बारे में शायद ही आपको पता हो| पांडवों की माता कुंती को वरदान मिला था की वो जिस भी देवता का आवाहन करेगी उनके वरदान से उन्हें एक तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा| परन्तु कुंती को इस बात बार विश्वास नहीं हुआ और इस वरदान की परीक्षा लेने के लिए कुंती ने सूर्य भगवान् का आवाहन किया था| कुंती के आवाहन पर सूर्य देव प्रकट हुए और एक तेजस्वी बालक की माता बनने का वर दिया| ये सुनते ही देवी कुंती रोने लगी क्योंकि वो अविवाहित थी और अगर कोई स्त्री विवाह के पहले माता बन जाती तो सारे समाज में उसे बुरी नज़रों से देखा जाता था|

इस पर सूर्य देव ने कहा की तुमने महर्षि के वरदान पर संशय किया इसका परिणाम तो तुम्हे भुगतना ही पड़ेगा| हार कर देवी कुंती वहां से वापस अपने महल आ गयी और जल्द ही उनके गोद में कर्ण था जो की कवच और कुंडल के साथ पैदा हुआ था| उस बालक की अनुपम छवि देख कर देवी कुंती का ह्रदय पसीज गया परन्तु उन्हें उस बालक को टोकरी में रख कर नदी में छोड़ दिया| उसी नदी में महाराजा ध्रितराष्ट्र का सारथि अधिरथ स्नान कर रहा था जब उसने बालक के रोने की आवाज सुनी तो टोकरी उठा कर घर ले आया| सूत अधिरथ और उसकी पत्नी राधा के कोई पुत्र नहीं अतः उन्होंने उस बालक का लालन पालन करने का जिम्मा उठाया|

बालक बचपन से ही अद्वितीय क्षमताओं का स्वामी था और जैसे जैसे वो बड़ा होने लगा वैसे वैसे उसकी क्षमताएं और प्रखर होने लगी| धनुर्विद्या में उसकी विशेष रूचि थी और धनुर्विद्या की शिक्षा के लिए वो राजगुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा और उनसे शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की| ये सुनते ही गुरु द्रोणाचार्य ने उसे यह कह कर मना कर दिया की वो राज गुरु हैं और सिर्फ राजकुमारों को ही शिक्षा प्रदान कर सकते हैं| ये सुनकर कर्ण ने उनसे उसे अपना शिष्य बनाने के लिए बड़ी विनती की तो उन्होंने कर्ण को कहा की सूतपुत्र का काम सारथि बनना है न की अश्त्र शस्त्र चलाना|

उनके कटु वचन सुन कर कर्ण को बड़ा क्रोध आया और उसने प्रतिज्ञा कर ली की वो ब्रम्हांड के सबसे उत्तम गुरु से शिक्षा प्राप्त कर गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य से भी बड़ा धनुर्धर बन कर दिखायेगा| इसी क्रम में उसकी मुलाकात भगवान् परशुराम से हुई और कर्ण ने अपना परिचय एक ब्राह्मण के रूप में दिया क्योंकि भगवान् परशुराम ने प्रण किया था की वो किसी भी क्षत्रिय को शिक्षा नहीं देंगे| एक दिन परशुराम और कर्ण जंगल में जा रहे थे| रस्ते में थकान की वजह से गुरु परशुराम ने आराम करने का विचार किया तब कर्ण ने परशुराम का सर अपनी गोद में रख लिया ताकि उनके विश्राम में कोई खलल न पड़े|

तभी एक कीड़ा आकर कर्ण की जांघ पर काटने लगा परन्तु गुरु की निद्रा न भंग हो इसलिए उन्होंने उस पीड़ा को सहन कर लिया| कीड़ा काटते हुए उनकी जांघ में बहुत अन्दर तक घुस गया और बड़ा ही गहरा जख्म बना दिया| उनके घाव से निरंतर रक्त बह रहा था जब रक्त बहते हुए परशुराम के पीठ तक पंहुचा तो उनकी नींद खुल गयी| वहां की स्थिति देख कर वो सारा माजरा समझ गए और कर्ण से पुछा की सत्य बताओ की तुम कौन हो क्योंकि ऐसा तो कोई क्षत्रिय ही कर सकता है| तब कर्ण ने उन्हें बताया की वो एक सूतपुत्र है और अपने झूठ के लिए क्षमा मांगी| इसपर क्रोधित हो कर भगवान् परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया की जैसे उसने छल से उनसे विद्या प्राप्त की है उसका वध भी छल से ही होगा और उनके द्वारा सिखाई गयी धनुर्विद्या की जिस वक़्त उसे सबसे ज्यादा जरूरत होगी उस वक़्त वो अपनी सारी विद्या भूल जाएगा|

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