गर्दभ पर विराजमान, हाथ में कलश तथा झाड़ू पकड़े हुई शीतला माता की कथा

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हिन्दू लेखों के अनुसार, धर्म में 33 करोड़ देवी देवताओं के बारे में बताया गया है| भारत देश में हिन्दू धर्म के लोग देवी-देवताओं में बहुत विश्वास रखते है| उनमे से एक है शीतला माता, इनका महत्व प्राचीन काल से चलता आ रहा है| इनकी सवारी एक गधा है अथवा हाथ में कलश और झाड़ू पकड़े हुए और नीम के पत्ते धारण किए हुई मिलती है| शीतला अष्टमी, होली के आठवें दिन मनाई जाती है और इस दिन महिलाएं व्रत रखती है और माता की पूजा करती है| जिससे परिवार में सुख शांति बनी रहती है|गर्दभ पर विराजमान, हाथ में कलश तथा झाड़ू पकड़े हुई शीतला माता की कथा

आइए जानते है शीतला माता की प्रचलित कथा के बारे में- 

एक बार हुआ यूं कि शीतला माता को सुझा की क्यों न वो पृथ्वी पर जाकर देखें कि कितने लोग उनका स्मरण करते है या उनकी पूजा करते है| यही देखने के लिए वह राजस्थान के डुंगरी गाँव में गई, वहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि उस स्थान पर उनका एक भी मंदिर नहीं था न ही वहां के लोग उनकी पूजा करते थे| यह सब देख कर वे निराश हो गई और गांव में इधर उधर भ्रमण करने लगी| तभी एक घर के ऊपर से चावल का उबलता हुआ पानी ठीक उसी जगह गिरा जहां माता शीतला खड़ी थी| उबलता पानी गिरने के कारण माता के शरीर में जलन होना शुरू हो गई और छाले भी निकल गए|गर्दभ पर विराजमान, हाथ में कलश तथा झाड़ू पकड़े हुई शीतला माता की कथा

आश्चर्यचकित बात यह थी कि पुरे गांव में माता की चिल्लाने की आवाज़े सुनाई दे रही थी क्योंकि उनका शरीर जल और तप रहा था, परन्तु उनकी सहयता के लिए कोई नहीं आया| एक कुम्हारन, जो अपने घर के बाहर बैठी थी, उसने देखा की बूढी माँ बुरी तरह जल चुकी है और उसका शरीर तप रहा है| यह सब देख उस महिला ने माँ को अपने घर के बाहर बिठाकर उनके शरीर पर ठंडा पानी डाला और परुथी जुवार के आटे की राबड़ी तथा दही खाने को दी| इसका सेवन कर माँ के शरीर को ठंडक प्राप्त हुई जिससे उनको थोड़ी सी राहत मिली|

माँ के सिर के बाल बिखरे देख उस महिला ने उनकी चोटी गुथना शुरू किया ही था कि  अचानक से कुम्हारन की नज़र बुजुर्ग माता के पीछे के बालों में छुपी आँख पर गई| ये सब देख कर महिला घबरा गई और वहां से भागने लगी| तो माता ने उसे रोका और कहा बेटी तुम्हें मझसे घबराने की जरूरत नहीं है| मैं प्रेत आत्मा नहीं, शीतला माता हूँ| इस पृथ्वी पर मैं देखने आयी थी लोगों में मेरे प्रति पूजा भावना को| परन्तु मझे यहाँ ऐसा कोई नहीं मिला जो मेरी पूजा करता हो| अपनी बात सुनाते सुनाते माँ अपने असली रूप में प्रकट हुई| गर्दभ पर विराजमान, हाथ में कलश तथा झाड़ू पकड़े हुई शीतला माता की कथा

शीतला माता को देखकर कुम्हारन सोच में पड़ गई की इन्हें कहां बिठाऊ क्योंकि वह बहुत गरीब थी| फिर उसने माता के समक्ष रोते हुए अपनी दुविधा रखी कि गरीबी होने के कारण उसके पास जगह नहीं है माता को बिठाने के लिए| ना उसके पास कुर्सी है ना ही चौंकी| शीतला माता ने उसकी दुविधा का समाधान निकाला, अपने हाथ में झाड़ू पकड़कर उसका घर साफ कर दिया और कुम्हारन से प्रसन्न होकर माँ ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा बेटी तुझे मझसे जो वरदान चाहिए मांग ले|

तब कुम्हारन ने बोला वो चाहती है कि माता इसी गांव में रहे और जो भी होली के बाद सप्तमी पर आपकी प्रार्थना सच्चे भाव से करेगा, आपको ठंडा जल तथा परूथा भोजन व दही का भोग लगाएगा उन्हें भी गरीबी के जाल से मुक्ति दिलाए| स्त्रियों को आशीर्वाद दें कि उनकी झोली भरी रहे और वे हमेशा सुहागिन रहें|गर्दभ पर विराजमान, हाथ में कलश तथा झाड़ू पकड़े हुई शीतला माता की कथा

तो माता ने कुम्हारन को वही वरदान दिया जिसकी उसने इच्छा प्रकट की और कुम्हार जाति को मुख्य अधिकार दिया उनकी पूजा करने का|

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