भारत में आज भी कुछ ऐसी जगहें है जहाँ के रीती रिवाज कल्पनाओं से भी पर हैं । आपको शायद ही पता हो की भारत जैसे देश में जहाँ हनुमान को मंगलवार का दिन समर्पित है कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ हनुमान को पूजने पर गाँव और समुदाय से निष्काशित कर दिया जाता है । जी हाँ ये कल्पना नहीं बल्कि ऐसा सच है जो की मानना मुश्किल है ।

आइये जानते हैं की क्यूँ लोग हनुमान जी का नाम लेने से भी कतराते हैं आखिर क्या है इसकी वजह | इसके लिए हमें सतयुग में हुए रामायण काल में चलना पड़ेगा | रामायण के अनुसार जब मेघनाद ने लक्ष्मण को शक्ति बाण से मृत्यु के समीप पंहुचा दिया था तब वैध सुशेन के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने चल पड़े थे । जब हनुमान जी हिमालय की गोद में स्थित द्रोणमाला पर्वत पहुचे तो संजीवनी बूटी पहचानने में असमर्थ रहे । हार कर उन्होंने विशाल रूप धारण किया और द्रोणगिरि पर्वत के रहुमाशाला कांडा नामक पर्वत को ही उठा लाये ।

यह भी कहा जाता है की जब भगवान् श्री राम सबरी के झूठे बेर खा रहे थे तो लक्ष्मण सिर्फ उन्हें खाने का दिखावा कर रहे थे और प्रभु श्री राम की नज़र बचा कर पीछे फेंकते जा रहे थे । कहा जाता है की बाद में जब उन बेरों से पौधे अंकुरित हुए तो संजीवनी बूटी बनी । और उसी बूटी के सेवन से लक्ष्मण के प्राण बचे थे |

द्रोणागिरी पर्वत के रहूमाशाला कांडा के आस पास के इलाकों में रहने वाले लोग हनुमान जी से इसी वजह से नाराज़ है क्योंकि रहूमाशाला कांडा को द्रोणागिरी पर्वत से उठा ले जाने से द्रोणागिरी पर्वत खंडित हो गया और हिन्दू मान्यता के अनुसार खंडित मूर्ती या वस्तु की पूजा करने से अहित होता है | बस इसी वजह से अगर कोई गलती से भी हनुमान का नाम ले लेता था तो उसे गाँव और समुदाय से बाहर कर दिया जाता था | हालाँकि ये पुराने समय की बात है अब धीरे धीरे लोगों की सोच बदल रही है | परन्तु आज भी यहाँ के लोग हनुमान जी की पूजा नहीं करते हैं |

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