जब त्रिपुरारी ने खंडित किया देवराज का अहंकार

देवताओं के राजा देवराज इंद्र को वर्षा के देवता माना जाता है| वेदों के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र बड़े ही अभिमानि स्वभाव के हैं उन्हें समय समय पर अपने ऊपर अभिमान होता रहता था| ऐसी ही एक कथा है जब त्रिपुरारी भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने बाल्य अवस्था में ही कईयों का घमंड चूर चूर किया था उनमें से एक देवराज इंद्र भी थे| कथा कुछ इस प्रकार से है की एक दिन सुबह सुबह श्री कृष्ण ने देखा की माता यशोदा और बाकी सभी ब्रजवासी पूजा की तैयारी कर रहें हैं|

भगवान् विष्णु के अवतार होने की वजह से उन्हें तीनों लोकों की खबर थी उन्हें पता था की ये सारी तैयारी वर्षा के देवता देवराज इंद्र की पूजा के लिए है| वहीँ दूसरी ओर देवराज इंद्र भी लापरवाह होते जा रहे थे साथ ही उनमे धीरे धीरे अहंकार बढ़ता जा रहा था उन्होंने अपने दरबार में आये संतों को भी अपमानित किया था| अतः श्री कृष्ण ने सोचा की देवराज का अहंकार चूर करने का यह अच्छा मौका है| उन्होंने अपनी मधुर आवाज़ में यशोदा मैया से पूछा की मैया आज सभी लोग सुबह सुबह किस चीज़ की तैयारी कर रहें हैं? तो मैया ने बड़े प्यार से कान्हा के सर पर हाथ फेरते हुए कहा की सभी वर्षा के देवता इंद्र देव की पूजा की तैयारी कर रहें हैं|

तब श्री कृष्ण ने अचंभित होने का नाटक करते हुए पुछा की हम इंद्र देव की पूजा क्यों करते हैं जबकि हमें अन्न और हमारी गायों को चारा तो गोवर्धन पर्वत से मिलता है| हमें तो इंद्र देव की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारे अन्नदाता तो वही हैं| श्री कृष्ण की बातें सुन कर सभी अचंभित रह गए और उनकी बातों का सार समझने के बाद सबने गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी| इससे इंद्र देव बड़े क्रोधित हुए की उनकी पूजा के स्थान पर ब्रजवासी एक पर्वत की पूजा कर रहे हैं| इससे रुष्ट होकर इंद्र देव ने बारिश शुरू कर दी उन्होंने बड़ी ही घन घोर बारिश शुरू हो गयी|

श्री कृष्ण देवराज की इस बचकानी हरकत पर मुस्कुरा उठे और सभी ब्रजवासियों और उनकी गायों को अपने पीछे आने को कहा| सभी उनकी बात मानकर उन के पीछे पीछे चल पड़े उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपने बाएं हाथ की छोटी ऊँगली पर उठा लिया और दाहिने हाथ से अपनी बांसुरी बजानी शुरू कर दी सभी उनकी मुरली की तान पर भाव विभोर हो उठे| तभी उन्होंने सुदर्शन चक्र और शेषनाग नाग को इशारे में उनके काम समझा दिए उनकी आज्ञा अनुसार सुदर्शन चक्र गोवर्धन पर्वत के ऊपर पहुँच कर बारिश का वेग कम करने लगे| वहीँ दूसरी ओर शेषनाग ने अपने शरीर से पर्वत के चारों ओर एक मेड का निर्माण कर लिया जिससे की बारिश का पानी बाहर ही बाहर बहता रहा| यह देख कर इंद्र देव ब्रम्हा जी की शरण में गए जहाँ उन्हें श्री कृष्ण की असलियत पता चली| यह जान कर की कृष्ण और कोई नहीं बल्कि विष्णु भगवान् के अवतार हैं उनका अभिमान चूर चूर हो गया और उन्होंने श्री कृष्ण से अपने किये की माफ़ी मांगी| तभी से गोवर्धन पूजा शुरू ही जो आज भी भारतवर्ष में बड़े हर्शोल्लाश के साथ मनाया जाता है|

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here