हिन्दू धर्म में मूर्ति-पूजा का महत्व

An Indian priest closes doors at the Ayyappa shrine at the Sabarimala temple in southern Kerala state after performing "purification" rituals following the entry of two women on January 2, 2019. - Two women secretly entered one of Hinduism's holiest shrines on January 2, breaching a blockade around the Sabarimala temple where devotees have been enraged by an Indian Supreme Court decision to overturn a ban on women aged between 10 and 50. (Photo by - / AFP)

अक्सर बालपन से ही हमें मंदिर जाना सिखाया जाता है| वहां जाना एवं पूजा-आरती करने की सीख हमेशा से हमें दी जाती है| और हमारा ऐसे लोगों से भी मिलाप होता है जो मंदिर और मूर्ति-पूजा को अंधविश्वास का नाम देते हैं| आज हम इस लेख में मंदिर और मूर्ति पूजा के बारे में जानेंगे| आज हम मूर्ति पूजा के पीछे के विज्ञान के बारे में बात करेंगे|

सबसे पहला प्रश्न आता है कि मंदिर क्या है? मंदिर का अर्थ है मन के अंदर और इसका शाब्दिक अर्थ ‘घर’ या स्थान होता है| मंदिर एक ऐसी जगह है जहां सकारात्मक ऊर्जा का संचालन होता है और परमात्मा के मिलन के लिए पहली सीढ़ी ही सकारात्मक ऊर्जा-शक्ति जो हमें मंदिर में मिलती है|

जिस प्रकार छोटे होते हुए हमे किसी भी चीज़ का ज्ञान नहीं था परन्तु धीरे-धीरे हमारे अंदर जिज्ञासा होने लगती है और हम जानने की कोशिश करते हैं| कुछ ऐसा ही है यहां भी है- पहले हम मंदिर जाएंगे, फिर और जानने के लिए हम रामायण, गीता जैसे ग्रंथो को पढ़ते हैं| जिज्ञासा बढ़ने के बाद हम पुराण, उपनिषद, और फिर वेद-शास्त्र पढ़ते हैं, जिससे हमे ब्रह्मज्ञान की समझ आने लगती है|

जब हम इन सीढ़ियों को पार करते हैं तो हमें मूर्ति नहीं मूर्ति के रूप में ईश्वर के दर्शन होते हैं| हिन्दू धर्म में मान्यता है कि ईश्वर सर्वव्यापी है यानि हर जगह मौजूद है| यदि भगवान हर चीज़ में है तो मूर्ति में भी होगा, बस श्रद्धा-भाव से देखने की ज़रूरत है|

माना जाता है कि मंदिर एक शरीर के समान है और उस शरीर के हृदय में ईश्वर की मूर्ति राखी हुई है|

  • मंदिर के गर्भग्रह को शरीर के चेहरे के समान माना गया है|
  • गोपुरा शरीर के पैरों के समान है|
  • शुकनासी को नाक माना गया है|
  • अंतराला (निकलने की जगह) को गर्दन माना गया है|
  • प्राकरा: (ऊँची दीवारें) इन्हें शरीर के हाथ माना गया है|

इस पूरे विज्ञानं के पीछे एक आध्यात्मिक अर्थ है कि भगवान को खिन ओर खोजने की ज़रूरत नहीं है बल्कि वे हमारे हृदय में बस्ते हैं| मंदिर में जाने से हमें सही दिशा में चलने का उपदेश मिलता है जिससे हम अच्छे कर्म कर के मोक्ष प्राप्त करते हैं|

जहाँ तक अन्धविश्वास की बात है तो ऋषियों ने कठिन तप कर इस ब्रह्मज्ञान को जाना है, उसके पश्चात उन्होंने ग्रंथ बनाये जिससे हमारा मार्ग-दर्शन हो पाए| मंदिरों और मूर्ति-पूजा के पीछे का विज्ञान यही कहता है कि मंदिर में जाने से सकारात्मक ऊर्जा-शक्ति हमारे शरीर और मस्तिष्क को स्वच्छ कर हमें सही दिशा दिखने की शक्ति देती है| इसे अन्धविश्वास का नाम देना गलत होगा|