आखिर क्यूँ करना पड़ा देवी को चामुण्डा रूप धारण

वेदों में कई ऐसी कथाएं हैं जिनसे आज भी लोग अछूते हैं आज हम बताते है ऐसी ही कथा के बारे में जिसके बारे में जान कर आप अचंभित रह जायेंगे| मतस्य पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार देवी चामुण्डा की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है यह कथा इस प्रकार से है|

एक बार की बात है जब देवधि देव महादेव शिव संभु तपस्या में लीन थे तो देवी पार्वती ने मज़ाक मज़ाक में उनके आँखों पर अपना हाँथ रख दिया| अचानक से अपने आँखों पर किसी का हाथ महसूस होते ही शिव जी ने अपना तीसरा नेत्र खोला जिससे प्रचंड अग्नि निकलने लगी|

उस प्रचंड अग्नि के प्रभाव से जो भी सामने पड़ा सब कुछ नष्ट होने लगा उसके दुष्प्रभाव से देवी पार्वती भी अछूती न रह सकीं| और उस प्रचंड अग्नि की ऊष्मा से उनके हाथों से पसीना आना शुरू हो गया जब पसीने की बूँद धरती पर गिरी तब उसने एक बालक का रूप ले लिया|

अन्धकार की वजह से उस बालक की आँखें नहीं थी जिसकी वजह से उसका नाम अंधकासुर पड़ा वह देखने में बड़ा ही भयंकर था| शिव और पार्वती की वजह से उत्त्पन्न होने की कारण वह भगवान् शिव का बड़ा भक्त था| असुर राज हिरण्याक्ष भी भगवान् शिव का भक्त था उसके पास सब कुछ था बस उसकी कोई संतान नहीं थी शिवजी ने उस बालक को असुरराज हिरण्याक्ष को सौंप दिया|

अंधकासुर को पुत्र के रूप में पा कर दैत्यराज हिरण्याक्ष बड़ा ही प्रसन्न हुआ और उसका लालन पालन अपने पुत्र की तरह करने लगा| जैसे जैसे वह बालक बड़ा होने लगा उसकी विलक्षण क्षमताएं भी उजागर होने लगी फिर उसने भगवान् शिव की कठोर तपस्या कर के उनसे 2000 पैर, 2000 हाथ, 2000 आँखें एवं 1000 सर का वरदान प्राप्त किया अब अंधकासुर पहले से भी भयंकर दिखने लगा था|

इधर अंधकासुर ने वरदान प्राप्त किया और उधर हिरण्याक्ष के पापों का घडा भर चूका था तो भगवान् विष्णु ने वाराह अवतार ले कर उसका वध कर दिया| जब अंधकासुर वापस आया तो उसे विष्णु द्वारा हिरण्याक्ष के वध की बात पता चली| यह सुनते ही उसका खून खौल उठा और उसने विष्णु समेत सभी देवताओं को जिनमे भगवान् शिव भी शामिल थे को अपना शत्रु मान लिया|

और प्रतिशोध लेने के लिए उसने देवलोक पर आक्रमण कर दिया भगवान शिव का अंश होने की वजह से उसमे अत्यधिक बल था साथ ही शिवजी द्वारा दिए गए वरदान ने भी उसे अजेय बना दिया था| जब देवताओं ने देखा की वो किसी भी प्रकार से अंधकासुर को पराजित नहीं कर पा रहें हैं तब वो भगवान् शिव की शरण में गए उनकी पुकार सुन कर भगवान शिव ने मातृकाओं को उत्त्पन्न किया जिन्होंने अंधकासुर का संहार किया|

उसके बाद सारी मातृकाएं एक शरीर बन गयी और देवी काली के सम्मुख पहुंची जहाँ देवी काली ने उन्हें वरदान दिया की वो देवी चामुण्डा के नाम से जानी जायेंगी और उन्हें शक्ति का स्वरुप माना जाएगा|