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जब श्री कृष्ण के अस्त्र सुदर्शन चक्र को हुआ अभिमान

भगवान् श्री कृष्ण की लीलाएं बड़ी न्यारी हैं कुछ ऐसी भी लीलाएं हैं जिनका उल्लेख ग्रंथों में तो मिलता है परन्तु वो इतनी प्रसिद्द नहीं है| भगवान् श्री कृष्ण ने कईयों का घमंड तोडा पर क्या आप जानते हैं की एक बार भगवान् श्री कृष्ण को अपने एक परम भक्त के अभिमान को चूर करने के लिए बजरंगबली हनुमान का सहारा लेना पड़ा था| दरअसल ग्रंथों में एक कथा उल्लेखित है जब उनके प्रिय भक्त उनके सुदर्शन चक्र को अपनी शक्ति पर अभिमान हो गया था|

बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था और पांडव सुख पूर्वक राज कर रहे थे और भगवान् श्री कृष्ण अपनी राजधानी द्वारिका नगरी में आराम से रह रहे थे| सब कुछ सही चल रहा था तभी भगवान् श्री कृष्ण के परम भक्त और उनके शस्त्र सुदर्शन चक्र को अपने ऊपर अहंकार हो गया| सुदर्शन चक्र को ऐसा लगने लगा की कोई भी उसकी शक्ति के आगे टिक नहीं सकता चाहे वो मनुष्य हो, देवता हो या दानव कोई भी उसके सम्मुख खड़ा नहीं हो सकता|

जब भगवान् श्री कृष्ण को ये बात पता चली तो उनके बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने सोचा की अगर इसका घमंड नहीं तोडा गया तो ये अपनी ताकत के मद में चूर हो कर बेलगाम हो जाएगा| और ताकत के मद में चूर होने के बाद तार्किकता और समझ साथ छोड़ देती है साथ ही ताकत के मद में चूर होने वाला किसी का भी अपमान कर सकता है|

भगवान् श्री कृष्ण ने बजरंग बलि हनुमान का ध्यान किया हनुमान जी उनके आवाहन पर सारी स्थिति समझ गए| भगवान् श्री कृष्ण के बुलावे पर हनुमान जी उनके दरबार में आने की बजाय उनके राजउद्यान में पहुँच गए|

जैसा की आप समझ ही सकते हैं की अगर एक उद्दंड वानर जब किसी राजउद्यान में खुला छोड़ दिया जाए तो क्या हो सकता है| जी हाँ उन्होंने उद्यान में पहुँचते ही वहां के पेड़ों पर चढ़ कर उधम मचाना शुरू कर दिया कुछ फल खाए कुछ फेंक दिए| वही हाल उन्होंने पुष्प वाटिका का भी किया सारा का सारा उद्यान तहस नहस कर के रख दिया पौधे और वृक्ष उखाड़ दिए|

जब वहां के रक्षकों को इस बात का पता चला तो उन्होंने सेना नायक को इस बारे में बताया उनकी बात सुनते ही सेना नायक भागता हुआ राज उद्यान में पहुंचा| वहां पहुँचते ही जब उसने वहां की हालत देखते ही उसने अपना सर पीट लिया और सैनिकों को उस उद्दंड वानर को पकड़ने का आदेश दिया|

उसका आदेश पाते ही सारे सैनिक उस उद्दंड वानर को पकड़ने को दौड़ पड़े परन्तु वो कोई साधारण वानर तो था नहीं सारे सैनिक थक कर चूर हो गए और उन्होंने सेना नायक को अपनी पूँछ में बाँध कर दूर फेंक दिया|

बेचारा चोटिल हो कर राज दरबार में पहुंचा और भगवान् श्री कृष्ण को सारी स्थिति से अवगत कराया| उसकी बातें सुनकर भगवान् श्री कृष्ण मुस्कुराने लगे और अपने सुदर्शन चक्र को द्वार की रक्षा करने का आदेश दिया| उनका आदेश पा कर सुदर्शन चक्र ने द्वार पर जगह ले ली उधर हनुमान जी समझ गए की इस नाटक का अंत करने का समय आ गया है|

वो भगवान् श्री कृष्ण के राज दरबार की ओर चल पड़े परन्तु द्वार पर ही सुदर्शन चक्र ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो हनुमान जी ने सुदर्शन चक्र को अपने मुंह में दबा लिया और श्री कृष्ण के आगे नतमस्तक हो गए| उसके बाद उन्होंने जब सुदर्शन चक्र को अपने मुंह से निकाला तो उसका घमंड चूर चूर हो चूका था|

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