Skip to main content

आखिर क्या है देवी दुर्गा के पहले रूप शैलपुत्री की कथा

नवरात्रों के प्रथम दिन में देवी दुर्गा के शैलपुत्री रूप को पूजा जाता है क्या आप जानते है देवी दुर्गा के पहले दिन पूजे जाने वाले स्वरुप के बारे में| देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पहला स्वरुप है देवी शैलपुत्री का जैसा की नाम से ही ज्ञात होता है देवी शैलपुत्री शैल यानी की पर्वत की पुत्री थी|

प्रजापति दक्ष की 13 पुत्रियों में से एक देवी सती थी और घर में सबसे धार्मिक प्रवृति की होने की वजह से उनका मन सदा ही पूजा पाठ में ज्यादा लगता था| इसी क्रम में जब उन्होंने अपने कुल गुरु से भगवान् शिव की कथा सुन कर और औं उनकी लीलाओं के बारे में जान कर मन ही मन अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया| भगवान् शिव को पाने के लिए देवी सती ने घोर तपस्या करना आरम्भ कर दिया परन्तु शिव को पाना इतना आसान नहीं था| कई वर्ष बीत गए साथ ही देवी सती की तपस्या और भगवान् शिव को पति के रूप में पाने का हठ बढती गयी|

उनकी तपस्या इतनी जटिल थी की पहले तो देवताओं को लगा की वो जल्द ही अपना हठ और तपस्या दोनों ही छोड़ देंगी| और अगर ऐसा हो जाता तो देव के देव महादेव शिव और देवी सती का विवाह नहीं हो पाता| परन्तु देवी सती का निश्चय इतना अटल था की उनकी तपस्या से देवलोक समेत कैलाश भी हिलने लगा| तब कहीं जाकर भगवान् शिव ने उन्हें दर्शन दिए और बहुत समझाने पर भी जब वो नहीं मानी तब हारकर उन्होंने उनके विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया|

प्रजापति दक्ष भगवान् ब्रम्हा के पुत्र थे इसलिए वो स्वयं के आगे भगवान् शिव को छोटा समझते थे और बेटी के हठ के आगे मजबूर हो कर शिव जी को अपने जामाता के रूप में स्वीकार कर लिया| लेकिन विवाह के समय ही उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया की उनका अपनी पुत्री से अब कोई नाता नहीं है| और आज के बाद अगर कोई भी शुभ कार्य होगा तो भी पार्वती और शिव को आमंत्रित नहीं किया जाएगा|

कई दिन बीत जाने के बाद एक बार प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया| प्रजापति दक्ष ने भगवान् शिव और देवी सती को छोड़ कर बाकी सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया| देवी सती को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने शिव जी से यज्ञ में चलने की जिद की तो शिव जी ने कहा की बिना निमंत्रण के कहीं भी जाना उचित नहीं है| लेकिन देवी सती नहीं मानी उन्होंने कहा की लगता है पिताजी ने सिर्फ बाहर वालों को आमंत्रण भेजा है और हम तो घर वाले हैं हमें तो वहां जरूर जाना चाहिए|

देवी सती ने भगवान् शिव की बात नहीं मानी और अकेली ही यज्ञ में सम्मिलित होने चली गयी| लेकिन वहां पहुँचने पर उनके पिता प्रजापति दक्ष ने उनका और उनके पति भगवान् शिव का अपमान करना शुरू कर दिया जिससे आहत होकर उन्होंने उसी यज्ञ कुंड में स्वयं को जला दिया| जब भगवान् शिव को ये पता चला तो वो वहां पहुंचे और जलती हुई देवी सती को अपने कंधे पर उठा कर कैलाश चल पड़े और इसी क्रम में देवी सती के हिस्से जहाँ जहाँ गिरे आज वहां शक्तिपीठ मौजूद है| आगे चल कर देवी सती का जन्म पर्वत राज के घर हुआ और उन्हें शैलपुत्री, उमा एवं पार्वती इत्यादि नामों से जाना गया| देवी शैलपुत्री को नव दुर्गा की उत्पत्ति का कारण माना गया है और इसी वजह से नवरात्रों में सबसे पहला दिन देवी शैलपुत्री को समर्पित है|

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

Hanuman Ji ne chhati chir ke dikhaya - हनुमान जी ने भरी सभा में अपना सीना डाला चीर

This is described in the later parts of the Ramayana. After Lord Rama came back from his vanavasa of 14 years and winning over Lanka Naresh Ravana, he was coronated as Ayodhya Naresh – the King of Ayodhya. In the celebration, precious ornaments and gifts were distributed to everyone. Hanuman was also gifted a beautiful necklace of diamonds by Sita – the wife of Rama. Hanuman took the necklace, carefully examined each and every diamond, pulled them apart, and threw them away. Most were surprised by his behaviour. When asked as to why he was throwing away the precious diamonds, he replied that he couldn’t find Rama in any one of them. Thus, they carried no worth to him since anything in which there is no Rama is without worth. When asked if Lord Rama was in Hanuman himself, he tore his chest apart to reveal his heart. The on-lookers, now convinced of his genuine devotion, saw the image of both Rama and Sita appearing on his heart.