Skip to main content

सर कटने के बाद भी मेघनाद क्यों हंसने लग गया था?

रामायण का जब भी जिक्र होता है तो उसमे राम, लक्ष्मण, रावण, कुम्भकरण, विभीषण, शूर्पनखा के साथ साथ मेघनाद का भी नाम जहन में अवश्य आता है| मेघनाद रावण का पुत्र था और अपने पिता रावण की तरह ही एक अत्यंत ही निर्दयी और क्रूर योद्धा भी था|

मेघनाद को इन्द्रजीत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उसने देवराज इंद्र पर विजय प्राप्त की थी| उसकी गर्जना बड़ी भयंकर थी जब वो गरजता था तो ऐसा प्रतीत होता था की मेघ गर्जना कर रहे हो इसी वजह से उसका नाम मेघनाद पड़ा था| सारी दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाला मेघनाद जब युद्ध भूमि में राम और लक्ष्मण के विरुद्ध रावण की तरफ से युद्ध करने आया तो उसने राम की वानर सेना को गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया| जब श्री राम ने देखा की मेघनाद उनकी सेना का संहार करता जाया रहा है तो उन्होंने लक्ष्मण को उसका वध करने का आदेश दिया|

उनकी आज्ञा पाते ही लक्ष्मण ने अपने तरकश के घातक बाणों के प्रहार से मेघनाद का वध कर दिया और उसका शीश काट कर ले आये| और उसकी एक भुजा को बाण की सहायता से उसके महल में बैठी उसकी अर्धांगिनी सुलोचना के पास पहुंचा दिया| सुलोचना ने जब अपने पति की भुजा देखि तो उसे भरोसा नहीं हुआ की उसके पति की मृत्यु हो चुकी है|

उसने उस भुजा को देखते हुए कहा की अगर वास्तव में ये मेरे पति की भुजा है तो ये हरकत कर अपना प्रमाण देगी इसके इतना बोलते ही भुजा में हरकत हुई और उस कटी हुई भुजा ने लक्ष्मण के बारे में लिखा की उस शूरवीर के हाथों मेरी मृत्यु हो चुकी है| तब जाकर उसे भरोसा हुआ की उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और इस सत्य को जानते ही वो विलाप करने लगी|

विलाप करती हुई सुलोचना अपने ससुर और मेघनाद के पिता रावण के पास पहुंची और उस कटी हुई भुजा को दिखा कर अपने पति का सर लाने की गुजारिश की और उसके साथ सती होने की इच्छा प्रकट की| इस खबर को सुनते ही रावण भी शोक में डूब गया और सुलोचना को इन्तेजार करने को कह कर रणभूमि की ओर चल पड़ा|

परन्तु सुलोचना रावण की बातों से बिलकुल भी आश्वश्त नहीं हुयी और मंदोदरी के समक्ष जाकर अपनी इच्छा प्रकट की तब मंदोदरी ने उसे श्री राम के सम्मुख जाने का निर्देश दिया और कहा की श्री राम बड़े दयालु हैं और वो तुम्हारी मांग अवश्य पूरी करेंगे|

सुलोचना श्री राम के पास गयी तो विभीषण ने श्री राम को बताया की ये मेघनाद की पत्नी है अपने पति के शीश के साथ सती होना चाहती है| सुलोचना ने श्री राम से अपने पति के शीश की मांग की और अपनी सारी कथा सुनाई उसकी कथा सुनकर भगवान् राम ने कहा की मैं मेघनाद को अभी जीवित कर देता हूँ| इसपर सुलोचना ने मना कर दिया और कहा की इस जीवन में जितने दुःख भोगने थे वो भोग चुके और आपके हाथों मृत्यु पाकर उन्हें परम पद की प्राप्ति होगी|

भगवान् राम की आज्ञा पाकर सुग्रीव मेघनाद का सर ले तो आये परन्तु उन्हें ये विश्वास नहीं हो पा रहा था की मेघनाद के कटे हुए हाथ ने लक्ष्मण के बारे में लिखा था| अतः उन्होंने सुलोचना से कहा की मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं हो पा रहा परन्तु मैं इसे तभी सत्य मानूंगा जब ये कटा हुआ शीश हंसेगा| ये सुलोचना के सतीत्व की परीक्षा की घडी थी और इतना सुनते ही मेघनाद का कटा हुआ सर जोर से हंसने लगा और और सुलोचना की बात पर सबको भरोसा हो गया|

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

श्री हनुमान चालीसा और उसका सम्पूर्ण अर्थ - Hanuman Chalisa

जय हनुमान जी की. भक्तों, आपको श्री हनुमान चालीसा के बारे में तो पता ही होगा। हो सकता है आप इसका जाप भी करते हों. परन्तु, क्या आपको चालीसा की सभी दोहों का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो आप नीचे लिखे हुए दोहे और उनके अर्थ के बारे में जान सकते हैं. Hanuman Chalisa ka matlab – What is the meaning of Hanuman Chalisa? दोहा 1 : श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि | बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि || अर्थ: “शरीर गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।” दोहा 2 : बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन-कुमार | बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार || अर्थ: “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।” दोहा 3 : जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥ अर्थ: “श्री हनुमान जी!आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कप