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भगवान् शिव ने ब्रम्हा जी का सर क्यों काटा और केतकी के फूल को श्राप क्यूँ दिया

भगवान् भोलेनाथ को कई वस्तुएं नहीं चढ़ाई जाती जैसे की लाल पुष्प शिवलिंग पर नहीं चढ़ाये जाते भगवान् शिव पर हमेशा ही सफ़ेद पुष्प अर्पित किये जाते हैं| पर केतकी के पुष्प सफ़ेद होने के बावजूद शिवलिंग पर अर्पित नहीं किया जाता| ऐसा माना जाता है की अगर गलती से भी भगवान् शिव पर केतकी के फूल चढ़ाया जाता है तो उसका दुष्परिणाम जल्द ही देखने को मिल जाता है|

और केतकी के फूल शिवलिंग पर चढाने वाले का अहित होता है साथ ही उसके घर में दुःख और दरिद्रता का वास हो जाता है| केतकी के फूलों को शिवलिंग पर न चढ़ाये जाने के पीछे भी एक कथा है आइये जानते हैं इसके बारे में|

एक बार की बात है ब्रम्हा जी और भगवान् विष्णु में विवाद हो गया विवाद का मुख्य विषय था की दोनों में से श्रेष्ठ कौन है| दोनों ही अपने को श्रेष्ठ बता रहे थे एक ओर ब्रम्हा जी स्वयं को सृष्टि के रचनाकार होने की वजह से श्रेष्ठ मानते थे वहीँ दूसरी ओर सारी सृष्टि के पालनहार भगवान् विष्णु स्वयं को श्रेष्ठ बता रहे थे|

बहुत देर तक दोनों में वाद विवाद चलता रहा परन्तु उनके विवाद का कोई निष्कर्ष नहीं निकला दोनों में से कोई भी दुसरे को श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं था|

विवाद बढ़ता देख कर भगवान् शिव वहां प्रकट हुए और शिवलिंग का रूप धारण कर लिया| भगवान् विष्णु और ब्रम्हा जी ने आपस में निश्चय किया की दोनों विपरीत दिशा में जाते हैं और शिवलिंग का छोर तलाशते है| जो भी शिवलिंग के छोर तक पहले पहुँच जाएगा वो ही श्रेष्ठ होगा|

दोनों फ़ौरन ही शिवलिंग के छोर की तलाश में निकल पड़े और अथक प्रयास करने पर भी भगवान् विष्णु शिवलिंग के छोर को नहीं ढूंढ पाए तो वो वापस आ गए| इधर ब्रम्हा जी भी शिवलिंग के छोर को ढूँढने के प्रयास में विफल रहे और वापस आ गए|

जब भगवान् विष्णु और ब्रम्हा जी का आमना सामना हुआ तो भगवान् विष्णु ने कहा की मैं अथक प्रयास करने के बावजूद शिवलिंग का छोर नहीं ढूंढ सका| भगवान् विष्णु की बात सुन कर ब्रम्हा जी के मन में वैमनस्यता आ गयी और उन्होंने भगवान् विष्णु से झूठ कह दिया की मैंने शिवलिंग का छोर ढूंढ लिया था और केतकी का वृक्ष इसका शाक्षि है|

यकीन न आये तो केतकी के वृक्ष से ही पूछ लो ये सुन कर केतकी के वृक्ष ने भी ब्रम्हा जी के पक्ष में झूठी गवाही दे दी| यह सुनते ही भगवान् शिव अपने रूप में वापस आ गए और क्रोध के मारे उन्होंने ब्रम्हा जी का सर काट दिया| और साथ ही केतकी के वृक्ष को श्राप दिया की उसके वृक्ष से उत्पन्न पुष्प कभी भी शिवलिंग पर स्वीकार्य नहीं होगा|

अगर कोई भी ऐसा करता है तो उसे बुरा परिणाम झेलना होगा और इसका उत्तरदायी वह स्वयं होगा साथ हो उसका सारा पुण्य नष्ट हो जायेगा|

 

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