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परंपरा के नाम पर बच्चों की सेहत से खिलवाड़ कहाँ तक उचित है?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ के रीती रिवाज समझ से परे हैं| हर राज्य यहाँ तक की हर जिले की अलग अलग परम्पराएँ हैं| कुछ परम्पराएँ तो खतरनाक होने के बावजूद भी निभाई जा रही हैं हम बात कर रहे हैं बैतूल की जो मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पर्वत के पठार पर स्थित है|यहाँ आज भी लोग सदियों से चली आ रही परंपरा के नाम पर ऐसे काम कर रहे हैं जिससे उनके बच्चों की जान खतरे में भी पड़ सकती है|

बैतूल में यदु वंशियों द्वारा गोबर का विशाल पर्वत बनाया जाता है उसके बाद उस पर्वत को फूलों से सजाया जाता है| उसके बाद वहां के निवासी पुरे हर्षोल्लास के साथ उस पर्वत का पूजन करते हैं और उसी दौरान अपने छोटे छोटे मासूम बच्चों को जबरन गोबर के पर्वत पर लिटा जाते है| वहां के लोगों की मान्यता है की गोवर्धन पर्वत पर पूजा के दौरान बच्चों को लिटाने पर भविष्य में उन्हें कोई भी बीमारी नहीं होगी| अपने बच्चों को हर रोग बिमारी से दूर रखने के उद्देश्य से लोग आज भी इस परंपरा को बेख़ौफ़ पहले की तरह निभाते आ रहे हैं|

आश्चर्य की बात तो ये है की ऐसा करने वाले सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों के भोले भाले लोग ही नहीं है बल्कि सहरों में रहने वाले पढ़े लिखे सभ्य लोग भी है| वहीँ दूसरी ओर डाक्टरों की माने तो उनके अनुसार पहले की बात अलग थी जब कीटनाशकों की जगह घरेलु खाद का इस्तेमाल होता था| तब के मुकाबले अब के घांस और चारे में केमिकल युक्त कीटनाशक का उपयोग धड़ल्ले से होना शुरू हो गया है जिसकी वजह से ना सिर्फ जानवर बल्कि लोग भी ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं| जानवर उसी केमिकल युक्त चारे को खा रहे है और उन्ही जानवरों का दूध लोग बाग़ बड़े चाव से पि रहें हैं| साथ ही केमिकल युक्त चारा खाने की वजह से उनके गोबर में स्क्रबटायफस नामक बैक्टेरिया पनपता है जो की बच्चों की सेहत खराब कर सकता है|

परन्तु यहाँ के लोगों का मानना है की अभी तक गोबर पर लिटाने की वजह से कोई भी बच्चा बीमार नहीं पड़ा है यही कारण है ही आज भी ये परंपरा ज्यो की त्यों चली आ रही है| वहीँ कुछ लोगों का मत ये भी है की हमें डाक्टरों की सलाह के मद्देनज़र अपने मासूम बच्चों की सेहत से कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहिए| हमें अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा का ख़याल खुद ही रखना होगा अगर कोई अनहोनी होती है तो फिर बाद में पछताने से अच्छा है की पहले ही बचाव का उपाय कर लिया जाए|

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