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जब एक पिता ने अपने ही पुत्र को अपनी बहन के हाथों मरवाना चाहा!

प्राचीन काल में असुरराज हिरन्यकश्यप नामक असुर के राज में आसुरी शक्तियां बहुत प्रबल होती जा रही थी| हिरन्यकश्यप बड़ा ही क्रूर और निर्दयी था उसने ब्रह्मा की घोर तपस्या की| उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उससे मनवांछित वर मांगने को कहा| इसपर हिरन्यकश्यप ने वर माँगा की उसकी मृत्यु न दिन में हो न रात में न तो उसे कोई नर मार सके न दैत्य न पशु और न देवता न उसका वध अस्त्र से हो न शश्त्र से न वह धरती पर मरे न आसमान में|इतना सुनते ही ब्रह्मा ने उसे तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए|

वर मिलते ही हिरन्यकश्यप शक्ति के मद में पागल हो गया| उसने मासूम लोगो पर तरह तरह के अन्याय करने शुरू कर दिए उसके आतंक से जनता त्राहि त्राहि करने लगी| यहाँ तक की देवता भी विचलित हो उठे देवाधिपति इंद्र सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुंचे| देवराज इंद्र ने उनसे पूछा की प्रभु आपका वरदान पाकर तो हिरन्यकश्यप निरंकुश हो गया है अगर ऐसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सारे ब्रह्माण्ड पर असुरों का राज हो जायेगा|

तब ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया की देवराज हर कार्य का एक निश्चित समय होता है| सही समय आने पर उसका निदान हो जायेगा आप विचलित न हों|

इधर हिरन्यकश्यप स्वयं को भगवान् मानने लगा था इतना ही नहीं उसने ये घोषणा करा दी की अगर कोई विष्णु की अराधना करता पाया गया तो उसे उसके कहर से कोई नहीं बचा पायेगा| उसने कितने ही संतों को मौत के घाट उतार दिया| परन्तु विधि के विधान के आगे किस की चली है उसका पुत्र प्रहलाद जो की भगवान् विष्णु का अनन्य भक्त था वो उसके महल में बिना किसी खौफ के भगवान् विष्णु की अराधना में मगन था| जब हिरन्यकश्यप को ये बात पता चली तो उसने प्रहलाद की बुआ और अपनी बहन होलिका को बुलाया| होलिका को वरदान प्राप्त था की कोई भी अग्नि उसे जला नहीं पायेगी|

होलिका बालक प्रहलाद को गोद में लेकर जलती चिता में बैठ गयी उस प्रचंड अग्नि में भी बालक निरंतर हरी नाम का जाप करता रहा इसपर अग्नि प्रकट होकर बोली पुत्र मैं हरी नाम स्मरण करने वाले का बाल भी बांका नहीं कर सकती परन्तु होलिका ने बुरी नियत से वरदान का दुरूपयोग किया है इसलिए इसे जला कर भस्म कर दूंगी| बालक चिता से सही सलामत वापस आ गया|

ये देख कर हिरन्यकश्यप ने उससे पूछा की विष्णु कहाँ है तो बालक ने जवाब दिया की हरी तो सर्वत्र हैं| गुस्से से हिरन्यकश्यप ने पूछा की क्या वो इस खम्भे में है तो बालक ने कहा हाँ है| हिरन्यकश्यप ने प्रहलाद को उसी खम्भे में बाँध दिया और कहा बुला अपने भगवान् को बालक ने सच्चे ह्रदय से प्रभु को पुकारा तभी अचानक खम्भे से एक विचित्र जीव प्रकट हुआ जो आधा नर था आधा सिंह उसने हिरन्यकश्यप को अपनी गोद में उठा लिया और अपने पीने नाखूनों से उसका सीना फाड़ दिया उस समय शाम का वक्त था| ब्रह्मा के वरदान के अनुसार न तो वो दिन में मारा न रात में न अष्ट्र से न शस्त्र से न नर से न पशु से न धरती पर न आकाश में|

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