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गणेश जी ने मूषक को ही क्यों चुना अपना वाहन

गौरी पुत्र भगवान श्री गणेश बुद्धि के देवता माने जाते हैं परन्तु क्या आपने कभी गौर किया है की उनका वाहन उनके शारीरिक ढाँचे के अनुरूप नहीं है| अगर आपका ध्यान इस ओर गया है तो आपके मन में भी यह ख़याल अवश्य आया होगा की उनका वाहन किसी बलिष्ट जीव को होना चाहिए था| फिर उन्होंने चूहे को ही अपने वाहन के रूप में क्यों चुना| इस बात का तार्किक उत्तर तलाशे तो पता चलता है की चूहे में भी बहुत उत्कंठा होती है जिसकी वजह से वह हर वस्तु को काट छांट कर उसके भीतर क्या है यह जानने की कोशिश करता है| और भगवान् गणेश भी उसे ही बुद्धि प्रदान करते है जिसमे उत्कंठा कूट कूट कर भरी हो|

परन्तु सिर्फ यही कारण नहीं है मूषक का भगवान गणेश का वाहन बनने के पीछे भी एक बहुत ही रोचक कथा है| एक बार की बात है देवराज इंद्र अपनी सभा में सभी देवगणों से साथ किसी गंभीर विषय पर बात कर रहे थे| उनकी सभा में देवताओं के साथ साथ गन्धर्व एवं अप्सराएं भी मौजूद थीं| इधर बाकी सभी लोग देवराज इंद्र की बात बड़े गौर से सुन रहे थे और साथ ही अपना बहुमूल्य मत भी बता रहे थे| परन्तु सभा में क्रौंच नाम का एक गन्धर्व भी मौजूद था जिसका ध्यान वहां हो रही चर्चा में बिलकुल नहीं लग रहा था| उसका ध्यान तो सभा में मौजूद अप्सराओं पर था साथ ही चंचल स्वभाव के क्रौंच ने उन अप्सराओं के साथ हंसी ठिठोली करना शुरू कर दिया|

पहले तो देवराज इंद्र ने उसकी इन हरकतों को नज़रंदाज़ किया परन्तु जब उसकी हरकतें हद से ज्यादा बढ़ गयी तो उन्होंने क्रौंच को इशारों में समझाया| परन्तु उस समय क्रौंच उन्माद में डूबा हुआ था उसने उनकी बात को नज़रअंदाज कर दिया और अपनी हरकतों में लगा रहा| उसकी इस ध्रिस्टता से क्रोधित हो कर देवराज इंद्र ने उसे मूषक बनने का श्राप दे दिया| श्राप देते ही क्रौंच गन्धर्व से मूषक में तब्दील हो गया तथा मूषक बनते ही इधर उधर भागना और उत्पात मचाना शुरू कर दिया| उसकी इन हरकतों से देवराज इंद्र का क्रोध और बढ़ गया उन्होंने फ़ौरन से उसे देवलोक से बाहर फेंकने का आदेश दे दिया| उनका आदेश पाते ही द्वारपालों ने मूषक को स्वर्ग लोक के द्वार से बाहर फ़ेंक दिया|

वहां से फेंकते ही वह सीधा पराशर मुनि के आश्रम में गिरा वहां उसने क्रोध के मारे सारे पात्रों को छिन्न भिन्न कर दिया| साथ ही पात्रों में रखा सारा अन्न एवं भोजन पदार्थ चट कर गया उसके बाद उसने पराशर मुनि की बगिया के भी सारे पौधे नष्ट कर दिए| साथ ही आश्रम में मौजूद सारे ऋषि मुनियों के वस्त्र एक धर्म ग्रन्थ भी कुतर डाले तब पराशर मुनि ने गजानन का आवाहन किया और उन्हें अपने आश्रम को इस चूहे के आतंक से बचाने का आग्रह किया| तब गणेश जी ने अपने पाश को उस मूषक को पकड़ कर लाने का आदेश दिया| पाश ने उसका पीछा किया और अंततः पाताल लोक में उसे पकड़ लिया|

जब वह गणेश भगवान के सम्मुख पहुंचा तो दर के मारे अनुनय विनय करने लगा| उसकी हालत देख कर गणेश जी को हंसी आ गयी उन्हें हँसता देख मूषक का दर दूर हो गया और उसने उनसे कहा की वो जो चाहे उससे मांग सकते है| यह सुनकर गणेश जी ने कहा ठीक है फिर तुम मेरे वाहन बन जाओ उसने कहा ठीक है और गणेश जी उसके ऊपर विराजमान हो गए| उनके वजन के कारण उसे अपनी साँसें रूकती ही सी महसूस ही तब उसने उनसे अपने प्राणों की भीख मांगी और कहा की प्रभु मुझे इतनी शक्ति दे की मैं आपका भार वहन कर सकूँ| तब गणेश जी ने तथास्तु कहा और तभी से मूषक गणेश जी का प्रिय वाहन बन गया|

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