Skip to main content

बात 1998 की है जब चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी

बात 1998 की है। लोकसभा चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी और राजग सबसे बड़ा गठबंधन बन कर उभरा था। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री नियुक्त किये गये थे। संसद में विश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही थी। कांग्रेस और सीपीएम ने मिल कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। दोनों पार्टियों के नेता साथ-साथ बैठे थे और भाजपा-एनडीए के ऊपर तीखे हमले कर रहे थे। जब कांग्रेस का कोई नेता बोलता तो सीपीएम के नेता मेज थपथपा कर उसका समर्थन करते और जब सीपीएम का कोई नेता बोलता तो कांग्रेस के नेता मेज थपथपा कर उसका समर्थन करते। एनडीए का कोई वक्ता जब कांग्रेस को निशाने पर ले के बाण छोड़ता, तो उस बाण से कांग्रेस को बचाने के लिए सीपीएम के सांसद ढाल ले कर सामने आ जाते। अटल बिहारी की सांप्रदायिक सरकार को रोकने के लिए सेक्युलर ताकतें एकजुट हो गईं थीं।

सरकार की तरफ से धुरंधर नेता जॉर्ज फ़र्नान्डीस ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा, “अध्यक्ष महोदय! मैं आपको बताना चाहता हूँ कि कांग्रेस पार्टी के बारे में इस देश के एक बहुत ही महत्वपूर्ण संगठन के क्या विचार हैं।” और जॉर्ज ने एक पतली सी पुस्तिका से पढना शुरू किया:

“Congress party is the fountainhead of corruption…(कांग्रेस सांसदों द्वारा शोर)…The British left and the Congress party replaced them. Over the past 50 years, Congress has established ever new records in corruption. (कांग्रेस सांसदों द्वारा पुनः शोर) Congress ministers have often been found embroiled in several scams, including Mundra scam, Churhat Lottery scam, Bofors scam, Sukhram scam, Harshad Mehta scam, JMM Bribery scam and Hawala, that took place during its regime. Congress has corrupted and misused every institution of the Indian democracy.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसद उत्तेजित हो जाते हैं और लोकसभा अध्यक्ष से मांग करते हैं, “Speaker sir! Please ask the honourable member to name the source We can’t allow him to read from any unnamed document. Please restrain him.”

जॉर्ज फ़र्नान्डिस कहते हैं, “Please don’t get impatient. I’ll definitely name the source. But first let me complete what it says. It says, “The Congress party’s record on Secularism too has been chequered. At various times in history, Congressi goondas took active part in riots and killed people. 3000 Sikhs were butchered by them on streets of Delhi and prime minister Rajiv Gandhi watched it silently.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसदों द्वारा फिर से शोर।

जॉर्ज कहते हैं, “Just give me two minutes…and then I’ll reveal the source”

जॉर्ज पुस्तिका से पढ़ना जारी रखते हैं “Speaker sir, it says, “No country in history has ever progressed with bad governance and excessive corruption as partners. None! The Congress suffers from this twin ailment since decades. Its survival is detrimental to the progress of India. Therefore, in the interest this nation, it’s important that Congress party is wiped out from this land for ever.”

कांग्रेस और कम्युनिस्ट सांसदों द्वारा ज़बरदस्त शोर।

“Speaker sir! It cannot go on like this. We will not allow him to speak any further if he doesn’t give the source he is quoting from.”

“Ok, Ok” जॉर्ज कहते हैं, “There is more to read. But since our friends from Congress and CPM are so desperate to know the source, let me tell you what I am reading from…

…I’m reading from the Manifesto of CPI(M) issued just before these Lok Sabha elections.”
सदन में सन्नाटा… कांग्रेस और सीपीएम के सांसद बगलें झाँकने लगते हैं..

जॉर्ज गरजे, “क्यों, साँप सूंघ गया? बोलती बंद हो गई? बड़ा बोल रहे थे, we want to know the source, we want to know the source. सोर्स का नाम सुनते ही लकवा मार गया?…खुद पर शर्म आ रही है? आनी भी चाहिए…My friends from the Left! Either you don’t read your own manifesto or you don’t mean a word of it. In either case, you should be ashamed of yourselves. In the name of secularism, you have joined hands with Congress that has broken all records in corruption. I urge you to introspect to determine your future course of action. And if you do not mend your ways, your party will become history, sooner rather than later.”

साभार

Comments

Popular posts from this blog

आखिर क्या था श्री राम के वनवास जाने के पीछे का रहष्य

रामायण में श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता को चौदह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा था और इसका कारण राम की सौतेली माता कैकयी को माना जाता है| लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था की महाराजा दशरथ को देवी कैकई की अनुचित मांग माननी पड़ी थी| आइये जानते है उस कथा के बारे में जिसकी वजह से भगवान् राम को वनवास जाना पड़ा और महाराज दशरथ की उस मजबूरी के पीछे के रहष्य के बारे में जिसकी वजह से उन्होंने देवी कैकई को दो वर देने का वचन दिया था| और उन्ही दो वचनों के रूप में उन्हें अपने प्राणों से प्रिये पुत्र राम को वनवास जाने का आदेश देना पड़ा| देवी कैकयी महाराजा दशरथ की सबसे छोटी रानी थी और उन्हें सबसे प्रिय भी थी| दरअसल बहुत समय पहले की बात है जब महाराजा दशरथ देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने के उद्देश्य से रणभूमि की और जा रहे थे तो देवी कैकयी ने भी साथ चलने का आग्रह किया| परन्तु महाराजा दशरथ ने ये कह कर मना कर दिया की युद्ध क्षेत्र में स्त्रियों का क्या काम स्त्रियाँ घर में अच्छी लगती हैं उनके कोमल हाथों में हथियार अच्छे नहीं लगते| देवी कैकयी उनकी बातें सुन कर बड़ी आहत हुई और भेष बदलकर महाराजा दशरथ के सारथि के रूप

भगवद गीता (अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय : श्लोक 1 - 28)

अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम । अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥ भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं॥1॥ अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन । प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ भावार्थ : हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं॥2॥ श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है॥3॥ अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌ । अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥ भावार्थ : उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पद

Hanuman Ji ne chhati chir ke dikhaya - हनुमान जी ने भरी सभा में अपना सीना डाला चीर

This is described in the later parts of the Ramayana. After Lord Rama came back from his vanavasa of 14 years and winning over Lanka Naresh Ravana, he was coronated as Ayodhya Naresh – the King of Ayodhya. In the celebration, precious ornaments and gifts were distributed to everyone. Hanuman was also gifted a beautiful necklace of diamonds by Sita – the wife of Rama. Hanuman took the necklace, carefully examined each and every diamond, pulled them apart, and threw them away. Most were surprised by his behaviour. When asked as to why he was throwing away the precious diamonds, he replied that he couldn’t find Rama in any one of them. Thus, they carried no worth to him since anything in which there is no Rama is without worth. When asked if Lord Rama was in Hanuman himself, he tore his chest apart to reveal his heart. The on-lookers, now convinced of his genuine devotion, saw the image of both Rama and Sita appearing on his heart.