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हनुमान जी की माता अंजना कैसे बनीं अप्सरा से वानर?

हिन्दू धर्म में श्रापों और वरदानों का सिलसिला बबुत ही आम बात है| हुनमान जी को श्राप था कि वे जब उन्हें उनकी शक्तियों का सबसे अधिक ज़रूरत होगी तब वे अपनी शक्तियां भूल जायेंगे| ना केवल हनुमान बल्कि उनकी माता को भी श्राप भोगना पड़ा था।

पुराणों के अनुसार

पौराणिक कथा के अनुसार यह पहले इंद्र की सभा में पुंजिकस्थली नाम की अप्सरा थीं। उनका अप्सरा से वानर बन जाने का कारण कुछ और नहीं बल्कि एक श्राप का असर था।

माना जाता है कि एक बार गलती से अंजना ने तप कर रहे एक ऋषि पर फल फेंक दिया| अपना तप टूट जाने के क्रोध से उस ऋषि ने अंजना को श्राप दिया कि जब भी उसे किसी से प्रेम होगा वह एक वानरी में बदल जाएगी और अपने अप्सरा के सौंदर्य से वंचित रह जाएगी। इसी पौराणिक कथा के अनुसार भगवान हनुमान को एक अप्सरा का पुत्र भी कहा जाता है।

इसके आलावा एक और कथा भी है जिसमें एक बार जब दुर्वासा ऋषि भी इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तो वह बार-बार भीतर आ-जा रही थी। इससे रुष्ट होकर ऋषि ने उसे वानरी हो जाने का शाप दे डाला। जब उसने बहुत अनुनय-विनय की, तो उसे इच्छानुसार रूप धारण करने का वर मिल गया। इसके बाद गिरज नामक वानर की पत्नी के गर्भ से इसका जन्म हुआ और अंजना नाम पड़ा। केसरी नाम के वानर से इनका विवाह हुआ और उनके गर्भ से हनुमान का जन्म हुआ।

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार

राजा महेन्द्र की कन्या का नाम अंजनासुंदरी था। राजा ने उसका विवाह प्रह्लाद के पुत्र पवनंजय से किया था। विवाह से पूर्व ही पवनंजय ने उसकी सखी को अपनी निन्दा करते सुना और अंजनासुंदरी को मौन देखकर उसकी सहमति मान ली। इस कारण से विवाह के बाद से उसने अपनी पत्नी से सम्पर्क नहीं रखा।

कुछ वर्ष के बाद रावण और वरुण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें रावण की सहायता के लिए पवनंजय को बुलाया गया। वन में उसने एक विरहिणी चकवी का विलाप देखा तो वह अंजनसुन्दरी के विचार से अशांत हो गया और उसी रात दूसरे व्यक्ति को सेनापति नियुक्त करके अंजनासुंदरी के पास गया। रात्रि व्यतीत होने पर अपने आने के प्रमाणस्वरूप अपनी मुद्रिका देकर वह युद्ध में भाग लेने के लिए चला गया।

अंजनासुंदरी को गर्भवती जानकर उसकी सास ने उसको अपशब्द बोले। मुद्रिका दिखाने पर भी वह विश्वास नहीं दिला पाई तथा उसे राज्य से निकाल दिया गया। पिता ने भी उसके साथ में वैसा ही व्यवहार किया। वह अपनी सखी के साथ ही वन में रहने लगी।

कुछ महीनें बाद उसने पुत्र को जन्म दिया। संयोगवश उसका मामा प्रतिसूर्य उधर से जा रहा था। समस्त घटनाओं के विषय में सुनकर वह अंजनासुंदरी को अपने साथ विमान में बैठाकर ले चला। बचपन में अंजना का पुत्र फिसलकर पर्वत की शिला पर गिर पड़ा-जो चूर्ण हो गई थी। अत: उसका नाम श्रीशैल रखा गया। क्योंकि हनुरुहनगर में उसे विशेष सत्कार मिला था, अत: वह हनुमान कहलाया।

वरुण को पराजित करके लौटने पर पवनंजय को अंजनासुंदरी नहीं मिली तो वह व्याकुल हो बैठा| जब प्रतिसूर्य से उसका मिलना हुआ तब उन्होंने पवनंजय को सारी कहानी विस्तार से सुनाई और पति-पत्नी का मेल कराया|

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