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कैसे विष्णु अवतार श्री कृष्ण पहुंचे अपने धाम ?

माना जाता है कि कुरुक्षेत्र की भूमि पर हुए युद्ध में कई योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी| इस के पश्चात वहां की मिट्टी का रंग लाल हो गया| महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की कहानी को 18 खण्डों में लिखा है। कुरुक्षेत्र का युद्ध इस ग्रंथ का सबसे बड़ा भाग है लेकिन युद्ध के पश्चात भी बहुत कुछ ऐसा रह गया जिसके विषय में जानना बहुत जरूरी है, जिनमें भगवान् श्रीकृष्ण की मृत्यु और द्वारका के नदी में समा जाने की घटना का उल्लेख है।

आइए जानते हैं क्या है महाभारत के युद्ध के बाद के खंडो में:-

यह घटना कुरुक्षेत्र के युद्ध के 35 साल बाद की है। कृष्ण की द्वारका नगरी बहुत शांत और खुशहाल थी| एक बार कृष्ण के पुत्र सांब को एक शरारत सूझी। स्त्री का वेश लेकर वह अपने दोस्तों के साथ ऋषि विश्वामित्र, दुर्वासा, वशिष्ठ और नारद से मिलने गया। वे सभी भगवान् श्रीकृष्ण के साथ एक बैठक में शामिल होने के लिए द्वारका आए थे। स्त्री के वेश में सांब ने ऋषियों से कहा कि वो गर्भवती है। वे उसे ये बताएं कि उसके गर्भ में बच्चे का लिंग क्या है?

उनमें से एक ऋषि ने सांब को समझ लिया और क्रोधित होकर उसे श्राप दिया कि वो लोहे के तीर को जन्म देगा, जिससे उसके कुल और साम्राज्य का विनाश होगा। सांब ने ये सारी घटना उग्रसेन को बताई, उग्रसेन ने सांब से कहा कि वे तांबे के तीर का चूर्ण बनाकर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दे, इस तरह उन्हें उस श्राप से छुटकारा मिल जाएगा। सांब ने सब कुछ उग्रसेन के कहे अनुसार ही किया। साथ ही उग्रसेन ने ये भी आदेश दिया कि राज्य में किसी भी प्रकार की नशीली सामग्रियों का ना तो उत्पादन किया जाएगा और ना ही वितरण|

इस घटना के बाद द्वारका के लोगों ने विभिन्न अशुभ संकेतों का अनुभव किया। सुदर्शन चक्र कृष्ण के शंख, उनके रथ और बलराम के हल काअदृश्य हो जाना, अपराधों और पापों में बढ़ोत्तरी होना, लाज-शर्म जैसी चीजों का समाप्त हो जाना। स्त्रियों द्वारा अपने पतियों और पुरुषों द्वारा अपनी पत्नियों के साथ विश्वासघात करना, आदि बेहद सामान्य घटनाक्रम हो गया था।

ये सब देखकर भगवान कृष्ण परेशान हो गए और उन्होंने अपनी प्रजा से प्रभास नदी के तट पर जाकर तीर्थ यात्रा कर अपने पापों से मुक्ति पाने को कहा। सभी ने ऐसा ही किया। परंतु जब सभी यादव प्रभास नदी के किनारे पहुंचे तो वहां जाकर सभी मदिरा के नशे में चूर हो गए। वे नाचते-गाते और मदिरा का सेवन करते।

मदिरा के नशे में चूर सात्याकि कृतवर्मा के पास पहुंचा और अश्वत्थामा को मारने की साजिश रचने और पांडव सेना के सोते हुए सिपाहियों की हत्या करने के लिए उसकी आलोचना करने लगा। वही कृतवर्मा ने भी सात्याकि पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए। बहस बढ़ती गई और इसी दौरान सत्याकि के हाथ से कृतवर्मा की हत्या हो गई। कृतवर्मा की हत्या करने के अपराध में अन्य यादवों ने मिलकर सात्यकि को मौत के घाट उतार दिया।

जब कृष्ण को इस बात का पता चला तो वे वहां पर प्रकट हुए और एरका घास को हाथ में उठा लिया। ये घास एक छड़ में बदल गई जिससे श्रीकृष्ण ने दोषियों को सजा दी। मदिरा के नशे में चूर सभी ने घास को अपने हाथ में उठा लिया और सभी के हाथ में मौजूद वो घास लोहे की छड़ बन गई। जिससे सभी लोग आपस में ही भिड़ गए और एक-दूसरे को मारने लगे। वभ्रु, दारुक और भगवान कृष्ण के अलावा अन्य सभी लोग मारे गए। जिसके बाद कृष्ण ने दारुक को पांडवों के पास भेजा और कहा कि अर्जुन को सारी घटना बताकर उससे मदद लेकर आए।

दारुक इन्द्रप्रस्थ की ओर रवाना हो गया और पीछे से ही श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग दिया। असल में हुआ कुछ इस तरह कि-

लोहे की छड़ का चूर्ण एक मछली से निगल लिया और वह उसके पेट में जाकर धातु का एक टुकड़ा बन गया। जीरू नामक शिकारी ने उस मछली को पकड़ा और उसके शरीर से निकले धातु के टुकड़े को नुकीला कर तीर का निर्माण किया। कृष्ण वन में बैठे ध्यान में लीन थे। जीरू को लगा वह कोई हिरण है, उसने कृष्ण पर तीर चला दिया जिससे श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई|

कुछ समय बाद अर्जुन मदद लेकर द्वारका पहुंचे और कृष्ण की मृत्यु की खबर पाकर अत्यंत दुखी हो गए। कृष्ण के जाने के बाद द्वारका में उनकी 16008 रानियां, कुछ महिलाएं, वृद्ध और बालक की शेष रह गए। वे सभी इन्द्रप्रस्थ के लिए रवाना होने लगे।

परंतु जैसे ही लोग द्वारका छोड़ने के लिए तैयार हुए, जल का स्तर बढ़ने लगा। द्वारका नगरी पानी के भीतर समा गई।अर्जुन, श्रीकृष्ण की कुछ रानियों और शेष प्रजा को लेकर इन्द्रप्रस्थ आ गए|

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