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समुद्र मंथन की कथा और उसके पीछे छिपा जीवन का उपदेश

हिन्दू धर्म में कई असुरों और देवताओं की कथाएं हैं| लेकिन यह कथा तब की है जब देवताओं ने धरती का निर्माण अथवा धरती को रहने लायक स्थान बनाने का सोचा| चलिए जानते हैं समुद्र मंथन की पूरी कथा:-

धरती का निर्माण करने के लिए समुद्र मंथन का होना ज़रूरी था क्योकि उस वक़्त धरती का छोटा सा हिस्सा जल से बाहर निकला हुआ था बाकि हर जगह पानी ही था| इतने बड़े कार्य के लिए केवल देवताओं की शक्ति काफी नहीं थी अपितु देवताओं के भाई राक्षसों की शक्ति का भी प्रयोग होना था| राक्षस इस कार्य को करने के लिए राज़ी हो जाते क्योंकि समुद्र मंथन से उन्हें अमृत मिलता जो उन्हें अमर कर देता|

अब इस कार्य के लिए किसी कारण का होना ज़रूरी था| तब त्रिदेव ने लीला रची और इंद्र के द्वारा ऋषि दुर्वासा का अपमान हो गया| फिर परिणामस्वरूप उसे अपने सिंहासन से हाथ धोना पड़ा तब इंद्र भगवान विष्णु की शरण में गए और उनकी सलाह पर वह सागर का मंथन करने के लिए तैयार हुए, जिसके बाद निकलने वाले अमृत को देवताओं को पिलाना था।

मंदार पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से समुद्र मंथन की तैयारी शुरू की गई। मंदार पर्वत के चारो ओर वासुकि को लपेटकर रस्सी की तरह प्रयोग किया गया। इतना ही नहीं विष्णु जी ने कछुए का रूप लेकर मंदार पर्वत को अपनी पीठ पर रखकर उसे समुद्र में नहीं डूबने दिया|

सबसे पहले मंथन के दौरान विष निकला जो सभी देवताओं और राक्षसों ने लेने से मना कर दिया मगर इस विष से पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती थी इसलिए शिव जी ने इसे पिया परन्तु पार्वती जी ने उनके गले को पकड़ लिया ताकि विष उनके शरीर में न जा सके| इस प्रकार यह विष उनके गले में ही अटक गया और उनका गला नीला हो गया| इसलिए शिव जी को नीलकंठ भी कहते हैं|

समुद्र मंथन के वक़्त कई और चीज़े निकलीं जैसे कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा नामक सफेद घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि नामक हीरा, कल्पवृक्ष पेड़, धन की देवी लक्ष्मी, देवों के चिकित्सक धनवंतरि आदि|

अब केवल अमृत के लिए सभी इंतज़ार कर रहे थे| असुरों के हाथ अमृत का प्याला ना लगे इसलिए भगवान विष्णु ने मोहिनी बन कर असुरों का ध्यान अमृत से हटाया और देवताओं को अमृत-पान कराया|

समुद्र मंथन में छिपा जीवन का उपदेश

इस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक संबध भी है| यह कथा सभी के लिए मार्गदर्शक है| आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो समुद्र का अर्थ है शरीर और मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं|

इस कहानी के किरदार हमारे जीवन से मेल खाते हैं जैसे:-

  • देवता सकारात्मक सोच और समझ को दर्शाते हैं वहीं असुर नकारात्मक सोच एवं बुराइयों के प्रतीक हैं|
  • समुद्र हमारे दिमाग के समान दिखाया गया है जिसमें कई तरह के विचारों एवं इच्छाओं की उतपत्ति होती है और समुद्र की लहरों के समान यह भी समय-समय पर बदल जाती हैं|
  • मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है। क्योंकि यह एक धार यानि एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है|
  • कथा में कछुआ यानि विष्णु जी ने अहंकार को हटा कर समुद्र मंथन का सारा भर अपनी पीठ पर लिया , ऐसे ही हमे भी अहंकार को हटा कर सबके हित में अथवा एकाग्रता की राह पर चलना चाहिए|
  • विष या हलाहल जीवन से जुड़े दुःख और परेशानियों का प्रतीक है| विष को पीने वाले महादेव बाधाओं को दूर करना सिखाते हैं|
  • मोहिनी यानि ध्यान का भटकना जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर करती है|
  • अमृत दर्शाता है हमारे लक्ष्य को यानि जीवन का सार|
  • मंथन के दौरान पाई जाने वाली वस्तुऐं सिद्धियों का प्रतीक हैं| यह सिद्धियां भौतिक दुःख दूर करने के बाद प्राप्त होती हैं|

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