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क्या है कुम्भ मेले का इतिहास? क्यों आता है ये 12 वर्षों के बाद?

कुम्भ मेले के बारे में अक्सर लोग यह जानते हैं कि यह मेला हर 12 वर्षों में एक बार लगता है परन्तु ऐसा क्यों होता है, यह काफी कम लोग ही जानतें हैं| आज हम कुम्भ मेले का इतिहास और उससे जुड़ी कुछ बातों के बारे में जानेंगे|
कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश है, परन्तु हिन्दू धर्म में कुम्भ का अर्थ है अमृत कलश जो समुद्र मंथन से उतपन्न हुआ था| उस अमृत को देवताओं ने ग्रहण किया था, इसकी कुछ बुँदे धरती पर भी गिरी थीं| धरती पर वह चार जगहें हैं- हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक| कलश के मुँह को भगवान विष्णु, गर्दन को भगवान शिव, कलश के तल को ब्रम्हा, बीच के भाग को सभी देवतागण और अंदर के जल को सागर का प्रतीक माना जाता है|
माना जाता है कि अमृत ग्रहण करने के लिए देवताओं और राक्षसों में युद्ध हुआ था, जो 12 दिन तक चला| देवलोक का 1 दिन पृथ्वीलोक के 1 वर्ष के बराबर होता है| इसलिए यह मेला 12 वर्षों बाद लगता है| असल में यह मेला नहीं बल्कि पर्व के रूप में मनाया जाता है|
यह तो हम जानते ही हैं की कुम्भ मेले का आयोजन प्राचीन काल से शुरू हो चूका था परन्तु इसका लिखित सबूत हमें बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख में मिलता है, जिसके अनुसार यह प्रथा कुछ 850 वर्षों से चली आ रही है| आठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के वक़्त कुम्भ के आयोजन का प्रमाण उस लेख में मिलता है|
कुम्भ मेले की तिथि का चयन
कुम्भ मेले की तिथि का चयन सूर्य और बृहस्पति के एक राशि से दूसरी राशि में जाने पर होता है|
  • हरिद्वार में कुम्भ का आयोजन तब होता है जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं|
  • प्रयाग में जब बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में आता है तभी कुम्भ का आयोजन होता है|
  • उज्जैन का कुम्भ मेला तब आयोजित होता है जब बृहस्पति और सूर्य दोनों वृश्चिक राशि में हों|
  • और नासिक में जब बृहस्पति और सूर्य सिंह राशि में होते हैं तब कुंभ मनाया जाता है|
कुम्भ में स्नान
कुम्भ के मेले में श्रद्धालुओं की करोड़ों में गणना होती है| लोग दूर दूर से कुम्भ के मेले में स्नान करने आते हैं| ऐसा माना जाता है कि जो कुम्भ में श्रद्धा भाव से स्नान करेगा उसकी हर इच्छा पूरी होगी, मोक्ष की प्राप्ति होगी एवं स्वर्ग के दर्शन होंगे|
  • स्कन्द पुराण में लिखा है कि कुम्भ के दौरान नदी में स्नान करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है|
  • अग्नि पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से कुम्भ में स्नान करेगा उसे करोड़ों गायों के दान का फल प्राप्त होगा|
  • ब्रह्म पुराण के अंतर्गत अगर हम कुम्भ के मेले में स्नान करेंगे तो अश्वमेध यज्ञ जैसा फल प्राप्त होगा|
  • कूर्म पुराण के अनुसार इस मेले में स्नान करने से सभी पापों धूल जाते हैं और इच्छानुसार फल प्राप्त होता है।
  • भविष्य पुराण के अनुसार यहां स्नान करने से स्वर्ग मिलता है और मोक्ष की प्रपत्ति होती है|
भारत की संस्कृति के दर्शन हमें मेले में आसानी से देखने को मिल जाते हैं| साधु-महात्मा, नेता, अभिनेता, विदेशी पर्यटक और आम जनता से बना जन-सैलाब कुम्भ के मेले में उमड़ता है और सभी यहां स्नान लेकर पुण्य कमाते हैं|

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