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साड़ी के टुकड़े - संत कबीर दास की कथा

एक समय की बात है एक नगर में अत्यंत शांत, नम्र तथा वफादार जुलाहा रहता था| उस जुलाहे ने अपने जीवन में कभी क्रोध नहीं किया था| उस नगर के कुछ लड़कों ने मिलकर सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी व्यक्ति को गुस्सा न आए| यह सोचकर सब जुलाहे के पास पहुंचे|

उन लड़कों में से एक लड़का बहुत अमीर घर से था| वहां पहुँच कर उस लड़के ने एक साड़ी उठायी और पूछा कि यह साड़ी कितने की दोगे?

जुलाहे ने जवाब देते हुए कहा कि 10 रूपए की|

जुलाहे को गुस्सा दिलाने के लिए लड़के ने साड़ी के दो टुकड़े कर दिए और बोलै कि यह एक टुकड़ा कितने का है?

जुलाहे ने बड़ी शान्ति से कहा 5 रुपए|

लड़के ने उस टुकड़े के और दो टुकड़े कर दिए और दाम पूछने लगा|

जुलाहे ने फिर शांति से जवाब दिया कि ढाई रुपए|

अपनी योजना सफल न होते देख लड़का इसी प्रकार साड़ी के टुकड़े करता गया और अंत में कहने लगा कि अब मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए। यह टुकड़े मेरे किस काम के?

जुलाहे ने लड़के को कहा कि बेटे! अब यह टुकड़े तुम्हारे ही क्या, किसी के भी काम के नहीं रहे|

यह सुनकर उस लड़के को थोड़ी शर्म आयी और वह कहने लगा कि मैंने आपकी साड़ी का नुक्सान किया है| अंतः मैं आपकी साड़ी का दाम दे देता हूँ|

पर जुलाहा पैसे लेने को तैयार नहीं था| जुलाहे के अनुसार जब उस लड़के ने साड़ी ली ही नहीं तो वह उससे पैसे कैसे ले सकता है|

अब लड़के के अंदर उसके पैसों का घमंड जागा और वह कहने लगा – मैं बहुत अमीर हूं| मैं रुपए दे दूंगा तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर तुम यह घाटा कैसे सहोगे? नुकसान मैंने किया है तो घाटा भी मुझे ही पूरा करना चाहिए|

यह सुनकर जुलाहे ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह घाटा तुम कभी पूरा नहीं कर सकते| सोचो, किसान का कितना श्रम लगा तब कपास पैदा हुई| फिर मेरी स्त्री ने अपनी मेहनत से उस कपास को बुना और सूत काता| फिर मैंने उसे रंगा और बुना| इतनी मेहनत तभी सफल होती जब इसे कोई पहनता, इससे लाभ उठाता, इसका उपयोग करता| पर तुमने उसके टुकड़े – टुकड़े कर डाले। रुपए से यह घाटा कैसे पूरा होगा?

यह सुनकर लड़के को एहसास हुआ कि वह कितना गलत था| उसकी आंखे भर आयी और वह जुलाहे के पैरों में गिर गया|

जुलाहे ने उस लड़के को उठाया और कहने लगे कि बेटा, यदि मैं तुम्हारे रुपए ले लेता तो है उस में मेरा काम चल जाता| पर तुम्हारी ज़िन्दगी का वही हाल होता जो उस साड़ी का हुआ| कोई भी उससे लाभ नहीं होता| साड़ी एक गई, मैं दूसरी बना दूंगा| पर तुम्हारी ज़िन्दगी एक बार अहंकार में नष्ट हो गई तो दूसरी कहां से लाओगे तुम? तुम्हारा पश्चाताप ही मेरे लिए बहुत कीमती है|

यह जुलाहा कोई और नहीं बल्कि कबीर दास जी थे|

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