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जीवन में थोडा फासला भी बहुत जरूरी है

कोई आदमी दुख में है तो तुम कहते हो कि इतने परेशान क्यों होते हो! यह सब चलता रहता है; संसार है! अपने को जरा दूर रखो। और यही दुख तुम पर आयेगा तो बडे मजे की बात है कि हो सकता है,यही आदमी, जिसको तुम सलाह दे रहे हो वह तुम्हें सलाह दे कि भाई, सुख दुख तो बाहर की वृत्तियां हैं।

बात क्या है? कारण क्या है? कारण यह है कि जब दूसरे पर दुख आता है, तब तुम साक्षी हो। इसलिए ज्ञान उत्पन्न होता है। दूसरे पर दुख आ रहा है, तुम पर तो आ नहीं रहा है। तुम सिर्फ देखनेवाले हो। इतने ही देखनेवाले जब तुम अपने दुख के लिए हो जाओगे, तब इतना ही ज्ञान तुम्हें अपने प्रति भी बना रहेगा। तुमने अभी अपना ज्ञान बांटा है।

मुल्ला नसरुद्दीन एक मनोचिकित्सक के पास गया और उसने कहा कि मेरी पत्नी की हालत अब खराब है, कुछ आपको करना ही पडेगा। मनोचिकित्सक ने अध्ययन किया उसकी पली का कुछ सप्ताह तक और कहा कि इसका मस्तिष्क तो बिलकुल खत्म हो गया है। नसरुद्दीन ने कहा कि ‘वह मुझे पता था। रोज मुझे बांटती थी, मुझे देती थी।

आखिर हर चीज खत्म हो जाती है। रोज थोडा— थोड़ा करके अपनी बुद्धि मुझे देती रही, खत्म हो गयी।’ तुम दूसरों को तो बुद्धि बांट रहे हो; लेकिन उसी बुद्धि का प्रयोग तुम अपने पर ही नहीं कर पाते।

अब जब दुबारा तुम्हारे जीवन में सुख आये तो तुम उसे ऐसे देखना जैसे किसी और के जीवन में आया हो। तुम जरा दूर खड़े होकर देखने की कोशिश करना। जरा फासला चाहिए। थोड़ा—सा भी फासला काफी फासला हो जाता है। बिलकुल सटकर मत खड़े हो जाओ अपने से। तुम अपने पड़ोसी हो। इतने सटकर मत खड़े हो जाओ।

नसरुद्दीन से मैंने पूछा कि जो रास्ते के किनारे पर होटल है, उस होटल का मालिक कहता है कि तुम्हारा बहुत सगा—संबंधी है, बहुत निकट का। नसरुद्दीन ने कहा ‘गलत कहता है। नाता है, लेकिन बहुत दूर का। बड़ा फासला है।’ मैंने पूछा. ‘क्या नाता है?’ तो नसरुद्दीन ने कहा कि हम एक ही बाप के बारह बेटे हैं। वह पहला है, मैं बारहवां हूं। बड़ा फासला है।

जरा दूरी रखो। दूरी के बिना परिप्रेक्ष्य खो जाता है, पर्सपैक्टिव खो जाता है। कोई भी चीज देखनी हो तो थोड़ा—सा फासला चाहिए। तुम अगर बिलकुल फूल पर आंखें रख दो तो क्या खाक दिखाई पड़ेगा; या फिर तुम दर्पण में तुम बिलकुल सिर लगा दो, कुछ भी दिखाई न पड़ेगा। थोड़ी दूरी चाहिए।

अपने से थोड़ी दूरी ही सारी साधना है। जैसे—जैसे दूरी बढ़ती है, तुम हैरान होकर देखोगे कि तुम व्यर्थ ही परेशान थे। जो घटनाएं तुम पर कभी घटी ही न थीं, तुमसे बाहर घट रही थीं, सिर्फ करीब खडे होने के कारण प्रतिबिंब तुममें पड़ता था, छाया तुम पर पड़ती थी, धुन तुम तक आ जाती थी—उसी प्रतिध्वनि को तुम अपनी समझ लेते थे और परेशान होते थे।

एक मकान में आग लगी थी और मकान का मालिक स्वभावत: छाती पीटकर रो रहा था। लेकिन एक आदमी ने कहा कि तुम नाहक परेशान हो रहे हो; क्योंकि मुझे पता है कि कल तुम्हारे लड़के ने यह मकान बेच दिया है। उसने कहा. ‘क्या कहा!’ लड़का गांव के बाहर गया था। रोना खो गया। मकान में अब भी आग लगी है।

वह बढ़ गयी बल्कि पहले से। लपटें उठ रही है, सब जल रहा है। लेकिन अब यह आदमी इस मकान से फासले पर हो गया। अब यह मकान—मालिक नहीं है। तभी लड़का भागता हुआ आया। उसने कहा ‘क्या हुआ? यह मकान जल रहा है? सौदा तो हो गया था, लेकिन पैसे अभी मिले नहीं है। अब जले के कौन पैसे देगा?’ फिर बाप अपनी छाती पीटने लगा। मकान वहीं का वहीं है। उसमें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। मकान को पता ही नहीं कि यहां सुख हो गया, दुख हो गया।

और फिर फर्क हो सकता है, अगर वह आदमी आकर कह दे कि कोई बात नहीं, मैं वचन का आदमी हूं; जल गया तो जल गया; खरीद लिया तो खरीद लिया; पैसे दूंगा। फिर बात बदल गयी।

सब बाहर हो रहा है। और तुम इतने करीब सटकर खड़े हो जाते हो, उससे कठिनाई होती है। थोड़ा फासला बनाओ। जब सुख आये तो थोड़ा दूर खड़े होकर देखना। जब दुख आये, तब भी दूर खड़े होकर देखना। और सुख से शुरू करना। ध्यान रहे दुख से शुरू मत करना।

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