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पुत्र प्राप्ति के लिए किये जाने वाली छठ पूजा की कथा

पूर्वोत्तर राज्यों में ख़ास कर बिहार और उत्तर प्रदेश में छठ पर्व बड़े ही स्वच्छता और और नियम के साथ मनाया जाता है| आपने भी छठ पर्व के बारे में अवश्य सुना होगा लेकिन क्या आप जानते हैं की इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई थी| आइये जानते हैं इस महा पर्व के शुरू होने की कथा के रहस्य के बारे में|

बहुत वर्ष पहले प्रियव्रत नाम के एक बड़े ही प्रतापी राजा थे प्रियव्रत अपनी पत्नी मालिनी के साथ ख़ुशी ख़ुशी जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके पास भगवान का दिया सबकुछ था कमी थी तो बस एक संतान की| उन्हें हमेशा यह चिंता खाए जाती थी की उनके बाद उनके वंश का नामों निशान मिट जाएगा और उनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा। महारानी भी अन्दर अन्दर घुटती रहती थी परन्तु अपने पति के सामने अपना दुःख जाहिर नहीं करती थी|

तब किसी ने उन्हें संतान प्राप्ति के लिए एक यज्ञ करवाने का सुझाव दिया उस यज्ञ को पूरा करने के लिए उन्होंने महर्षि कश्यप को पुरोहित के रूप में यज्ञ में सम्मिलित होने की विनती की। महर्षि कश्यप ने उनकी बात सहर्ष स्वीकार कर ली और एक निश्चित तिथि को यज्ञ आरम्भ कर दिया|

यज्ञ पूर्ण होने के कुछ दिनों के उपरान्त ही महाराजा प्रियव्रत की पत्नी रानी मालिनी गर्भवती हो गयी| महाराज प्रियव्रत को जब यह शुभ समाचार मिला तो वो बड़े प्रसन्न हुए और सारे राज्य में मिठाइयाँ बटवाई| परन्तु नौवें महीने के पूर्ण होते ही रानी मालिनी के गर्भ से एक मृत शिशु ने जन्म लिया यह देख कर रानी बेहोश हो गयी|

वही दूसरी ओर महाराज प्रियव्रत की स्थिति भी ठीक नहीं थी वो इतने दुखी थे की उन्होंने मन ही मन आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया। जैसे ही उन्होंने अपने पूजा घर में जाकर दुखी मन से देवी के सामने नतमस्तक होकर अपना शीश काटने के लिए खडग उठाया वैसे ही उनकी कुल देवी देवी खाशंती प्रकट हुईं|

उन्हें सामने पाकर राजा का धैर्य जवाब दे गया और वो देवी के समक्ष बच्चों के सामान विलाप करने लगे| तब देवी ने उन्हें ढाढस बंधाया और कहा की राजन तुम व्यर्थ ही चिंतित हो रहे हो जो मनुष्य सच्चे ह्रदय और लोक कल्याण की भावना से मेरी कड़ी तपस्या करता है उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। उनकी बात सुनकर महाराज प्रियव्रत की हिम्मत बंधी और उन्होंने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।

उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हो कर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी बालक का पिता बनने का वरदान दिया और इसके फलस्वरूप रानी मालिनी के गर्भ से एक बड़े ही सुन्दर और तेजस्वी बालक का जन्म हुआ जो आगे चल कर उनका उत्तराधिकारी बना। उस घटना के बाद से छठ पूजा की जाने लगी जिसमे सूर्य देव और उनकी पत्नी देवी उषा जिन्हें देवी खाशंती या फिर छठी मैया के नाम से भी जाना जाता है की पूजा की जाने लगी।

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