एक ऋषि के वरदान ने की थी द्रौपदी की चीरहरण से रक्षा – शिवपुराण

महाभारत में एक प्रसंग आता है जब कौरव द्रौपदी का चीर हरण करते हैं| हम सभी जानते हैं कि उस समय श्री कृष्ण ने द्रोपदी को भरी सभा में बेइज्जत होने से बचाया था| परन्तु शिवपुराण के अनुसार दुर्वासा ऋषि के वरदान के कारण ही श्री कृष्ण ने द्रोपदी की रक्षा की| आइए जानते हैं दुर्वासा ऋषि ने द्रोपदी को ऐसा कौन – सा वरदान दिया था जिस कारण द्रोपदी की लाज बच पायी|

जब कौरवो और पांडवों के बीच हुए चौसर के खेल में  युधिष्ठिर अपनी पत्नी द्रौपदी को हार गए तब द्रौपदी का अपमान करने के लिए दुर्योधन ने द्रोपदी को कौरवों की सभा में आने के लिए बुलावा भेजा| जब द्रोपदी ने आने से मना कर दिया तब उन्हें बालों से खींच कर भरी सभा में लाया गया| द्रोपदी को सभा में लाने के बाद दुर्योधन के कहने पर दुःशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण करके का प्रयास किया गया| परन्तु उस समय द्रोपदी ने श्री कृष्ण को याद किया तो श्री कृष्ण ने द्रोपदी के वस्त्र को बढ़ा कर द्रोपदी की रक्षा की|

यहां चाहे श्री कृष्ण ने द्रोपदी को लज्जित होने से बचाया| परन्तु श्री कृष्ण द्रोपदी को मिले एक वरदान के कारण ही यह सब कर पाए| द्रोपदी को ऋषि दुर्वासा ने वरदान दिया था कि द्रौपदी को संकट के समय अन्नत (कभी खत्म न होने वाले) वस्त्र प्राप्त होगा|

इस वरदान के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है जिसका वर्णन शिवपुराण में किया गया है| इसके अनुसार भगवान शिव के अवतार ऋषि दुर्वासा एक बार स्नान करने के लिए नदी के तट पर गए थे| उस नदी का बहाव बहुत तेज था| जिस कारण ऋषि दुर्वासा के कपड़े नदी में बह गए| उसी नदी में कुछ दुरी पर द्रोपदी भी स्नान कर रही थी| ऋषि दुर्वासा ने द्रोपदी से सहयता मांगी तो द्रौपदी ने उनकी मदद करने के लिए अपने वस्त्र में से एक टुकड़ा फाड़कर ऋषि को दे दिया| इस बात से ऋषि दुर्वासा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने द्रोपदी को संकट के समय उनके वस्त्र अन्नत हो जाने और उनकी रक्षा का वरदान दिया| इसी वरदान के कारण दुःशासन द्वारा द्रौपदी की साड़ी खींचने पर वह बढ़ती ही गई और द्रोपदी के सम्मान की रक्षा हुई| जिसमें श्री कृष्ण ने सहायता की थी|

ऋषि दुर्वासा भगवान शिव के अवतार हैं| यह ब्रह्म देव के मानस पुत्र अत्रि और उनकी पत्नी अनुसुइया के पुत्र के रूप में जन्में थे| अत्रि और उनकी पत्नी अनुसुइया ने भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों की कठोर तपस्या की| इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर तीनों देव प्रकट हुए और उनसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा| अत्रि और अनुसूया ने वरदान में तीनों देवों को अपने पुत्रों के रूप में जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की|

इसी वरदान के फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, विष्णु का अंश से दत्तात्रेय और शिव के अंश से दुर्वासा उत्पन्न् हुए| ऋषि दुर्वासा भगवान शिव के रुद्र रूप से उत्पन्न हुए थे, इसलिए वे अधिक क्रोधी स्वभाव के थे|

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